ट्रैफिक जाम का समाधान तलाशना मुश्किल हो चुका है। तमाम इंतजाम फेल साबित हो रहे हैं। वाहनों की बढ़ती भीड़ के आगे ट्रैफिक सुचारू करने की व्यवस्था बौनी हो चुकी है। ट्रैफिक पुलिस गाड़ियों पर से काली फिल्म हटाने के साथ कुछ गैरकानूनी ‘लिखावट’ मिटाने को ही सबसे बड़ा काम माना जा रहा है। लगे हाथ जुर्माने में आई राशि को प्रचारित करने के साथ पुलिस यह बताने में जुटी है कि इस अभियान में आज कितने चालान हुए। मतलब साफ है कि ट्रैफिक से जुड़ी समस्या से पब्लिक को निजात दिलाने का ड्यूटी मानों इनकी है ही नहीं। हालत यह हो गई है कि राजधानी जयपुर में 30 मिनट का सफर घंटे-सवा घंटे में पूरा हो रहा है। कई बार तो एम्बुलेंस तक जाम में फंस जाती है। प्रदेश के अधिकांश बड़े ही नहीं छोटे शहरों-कस्बों तक में यही हालात है। हर दो चार दिन में ट्रैफिक समस्या को सुधारने पर विचार-विमर्श होता है पर यह काम नहीं आ रहा।
ऐसे में सवाल तो उठता ही है कि आखिर प्रशासन इतना बेबस क्यों है या फिर जैसा है-वैसा चलने देने पर सबकी मौन स्वीकृति जारी कर दी गई है। मजे की बात यह कि ट्रैफिक नियंत्रित करने के लिए पग-पग पर बत्ती के साथ ट्रैफिक पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए हैं। नियम तोड़ने पर जुर्माना भी बढ़ा दिया गया है, बार-बार ऐसा करने पर लाइसेंस तक निलंबित होने लगे हैं पर बेतरतीब ट्रैफिक व्यवस्था कब्जे में नहीं आ पाई। होने को तो यातायात सलाहकार समिति की बैठकें तो होती है, लेकिन इनमें होने वाले फैसले जमीन पर नहीं उतरते। चर्चा होती है, अफसरों को आदेश दिए जाते हैं और बैठक कार्यवाही रजिस्टर में दर्ज कर जिम्मेदारी की ‘इतिश्री’ मान ली जाती है। स्थिति यह है कि प्रशासनिक बदइंतजामी का खामियाजा जनता भुगत रही है। यातायात व्यवस्थित करने का जिम्मा संभाल रहे जिम्मेदार ट्रैफिक पुलिसकर्मियों को सिर्फ चालान का टारगेट देकर अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे हैं। आलम यह है कि व्यवस्था बिगड़े तो बिगड़े, तैनात पुलिसकर्मी का लक्ष्य तो चालान काटने तक ही सीमित रह गया है। स्टाफ के नाम पर गिने-चुने पुलिसकर्मी और वो भी ट्रैफिक संभालने के बजाय चालान-जुर्माने पर ज्यादा ध्यान देंगे तो व्यवस्था कैसे सुधरेगी।
असल में यह सब इसलिए भी नहीं हो रहा कि जिम्मेदार ही न गंभीर हैं न ही ईमानदार। बड़े चौराहों पर तैनात ट्रैफिक पुलिसकर्मी ही सजग दिखते ही तब हैं जब किसी चालक को पकड़कर ‘सजा’ देनी हो। बिना हेलमेट वाले को दौड़ कर पकड़ लेते हैं, गलत दिशा से आने-जाने वाले वाहनों को भी नहीं छोड़ते पर ऐसे में भले ही कहीं कोई गलत पार्किंग हो या फिर आड़े-तिरछे वाहन, ‘खास वजह’ से इन पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती। अवैध अतिक्रमण तो खैर हटना ही नहीं है, सड़क तक खोमचे वाले ही नहीं बड़े-बड़े दुकानदार तक कब्जा जमा लेते हैं, ऐसे में सड़क जब संकरी होगी तो वाहनों को गुजरने में परेशानी तो होनी ही है। इधर-उधर से फोन कराकर साफ बचने वाले वाहन चालकों की भी कमी नहीं है, इन्हीं लोगों को दिया जाने वाला संरक्षण भी इस समस्या को बढ़ाने की बड़ी वजह है। ट्रैफिक व्यवस्था केवल चालान-जुर्माने से ही नहीं सुधरने वाली, इसके अन्य कारणों का भी निदान करना होगा। साथ ही उन ट्रैफिक पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई करनी होगी जो अपनी ड्यूटी गंभीरता और ईमानदारी से नहीं निभा रहे।



