खुशहाल शहर जयपुर की ‘बेहाली’ भी तो देखिए 

    खुशहाली केवल लोगों से पूछे गए कुछ सवालों के जवाबों से नहीं मापी जा सकती। उसकी असली कसौटी शहर की बुनियादी सुविधाएं, नागरिकों का जीवन स्तर और रोजमर्रा की परेशानियां होती हैं। सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि खुशहाल शहर सर्वे से नहीं, बल्कि काम से बनते हैं। जब सड़कें बेहतर होंगी, सफाई व्यवस्था प्रभावी होगी, ट्रैफिक व्यवस्थित होगा, अतिक्रमण पर अंकुश लगेगा, जलभराव खत्म होगा और नागरिक सुविधाएं वास्तव में सुधरेंगी, तब किसी सर्वे की जरूरत नहीं पड़ेगी। जनता स्वयं कहेगी कि जयपुर सचमुच खुशहाल है।

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    जयपुर दुनिया का छठा सबसे खुशहाल शहर बनकर उभरा है, जो देश के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि है। ऐसे में तो हम सबका खुश होना लाजिमी भी है, आखिर हम यहां जो रह रहे हैं। ग्लोबल ट्रैवल और लाइफस्टाइल मैगजीन टाइम आउट की साल 2026 की दुनिया के सबसे खुशहाल शहरों की लिस्ट जारी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, जयपुर अपने बेहतरीन और अनोखे संतुलन के कारण लोगों को सबसे ज्यादा मानसिक शांति और खुशी देता है। देशभर में छठे नंबर पर आने वाला जयपुर क्या वाकई खुशहाल शहर है?  यह शहर अपनी विरासत, संस्कृति, खानपान, पर्यटन और जीवनशैली के कारण देश-दुनिया में अलग पहचान रखता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल एक सर्वे की रैंकिंग से किसी शहर की वास्तविक खुशहाली तय हो जाती है? क्या जयपुर की सड़कों पर रोज सफर करने वाला हर आम आदमी खुश है? अगर शहर की असल तस्वीर देखी जाए तो कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब खुशहाली की रैंकिंग नहीं देती। बरसात शुरू होते ही जगह-जगह जलभराव, टूटी-फूटी सड़कें, सीवरेज कार्यों के बाद महीनों तक नहीं भरे गए गड्ढे, बढ़ता अतिक्रमण, ट्रैफिक जाम, गंदगी के ढेर और बदहाल सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था भी तो जयपुर की पहचान बने हुए हैं। कई कॉलोनियों में तो लोगों का घर से निकलना तक मुश्किल है।

    स्वच्छता के दावों के बावजूद शहर के अनेक इलाकों में नियमित सफाई नहीं होती। नालों की समय पर सफाई नहीं होने से हर बारिश में सड़कें तालाब बन जाती हैं। नगर निगम, जयपुर विकास प्राधिकरण, जलदाय विभाग और अन्य एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी का खामियाजा आम नागरिक भुगतता है। सड़कों की हालत तो अलग ही कहानी कहती है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद कई सड़कें पहली बारिश में ही उखड़ जाती हैं। सीवरेज और पाइपलाइन डालने के बाद सड़कें महीनों तक अधूरी छोड़ दी जाती हैं। यही कारण है कि सड़क हादसों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आखिर यह कैसी खुशहाली है, जहां नागरिक सुरक्षित और सुविधाजनक सफर भी नहीं कर पा रहे? ट्रैफिक व्यवस्था भी लगातार बिगड़ रही है। वाहन बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन सड़कें और पार्किंग की व्यवस्था उसी अनुपात में विकसित नहीं हो रही। सार्वजनिक परिवहन अभी भी लोगों की जरूरत पूरी नहीं कर पा रहा। मेट्रो का विस्तार धीमी गति से चल रहा है और ई-बसों के बावजूद कई क्षेत्रों में लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है।

    बेशक, जयपुर में शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, रोजगार और सांस्कृतिक गतिविधियों के अनेक अवसर हैं। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग यहां बसना चाहते हैं। लेकिन खुशहाली केवल आर्थिक अवसरों या सांस्कृतिक विरासत से नहीं आती। स्वच्छ वातावरण, सुरक्षित सड़कें, सुगम यातायात, बेहतर नागरिक सुविधाएं और जवाबदेह प्रशासन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। ऐसे सर्वे सरकार के लिए आत्ममंथन का अवसर होने चाहिए, आत्मसंतोष का नहीं। यदि जयपुर वास्तव में देश के सबसे खुशहाल शहरों में शामिल है तो उसे इस स्थान के अनुरूप सुविधाएं भी देनी होंगी। शहर की सुंदरता केवल परकोटे, हवामहल और पर्यटन स्थलों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि हर कॉलोनी, हर सड़क और हर मोहल्ले में दिखाई देनी चाहिए। जयपुर के नागरिक इस सम्मान पर गर्व जरूर करें, लेकिन सरकार और प्रशासन को इसे उपलब्धि मानकर बैठने के बजाय उन कमियों को दूर करने पर ध्यान देना होगा जो हर दिन लोगों की जिंदगी को कठिन बना रहा है। खुशहाली केवल लोगों से पूछे गए कुछ सवालों के जवाबों से नहीं मापी जा सकती। उसकी असली कसौटी शहर की बुनियादी सुविधाएं, नागरिकों का जीवन स्तर और रोजमर्रा की परेशानियां होती हैं। सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि खुशहाल शहर सर्वे से नहीं, बल्कि काम से बनते हैं। जब सड़कें बेहतर होंगी, सफाई व्यवस्था प्रभावी होगी, ट्रैफिक व्यवस्थित होगा, अतिक्रमण पर अंकुश लगेगा, जलभराव खत्म होगा और नागरिक सुविधाएं वास्तव में सुधरेंगी, तब किसी सर्वे की जरूरत नहीं पड़ेगी। जनता स्वयं कहेगी कि जयपुर सचमुच खुशहाल है।

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