शहर के यातायात को सुव्यवस्थित करने के लिए जयपुर विकास प्राधिकरण ने फिर एक महत्पूर्ण कदम उठा लिया है। ट्रैफिक कंट्रोल बोर्ड की बैठक में कई दूरगामी निर्णय भी लिए गए, इनके ठीक ढंग से लागू होते ही जनता को राहत मिलना तय माना गया। यातायात सुधार की सबसे बड़ी पहल बताते हुए जिम्मेदारों ने अतिक्रमण हटाने से लेकर पार्किंग समेत अन्य आवश्यक कार्रवाई का भी भरोसा दिलाया। ऐसा नहीं कि यह कोई पहली पहल थी, समय-समय पर इस तरह की बैठक होती रही है, निर्णय भी लिए गए पर आमजन को राहत नहीं मिल पाई।
जयपुर में ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर समय-समय पर ट्रैफिक कंट्रोल बोर्ड की बैठकें होती हैं। इनमें पुलिस, जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए), नगर निगम, परिवहन विभाग, लोक निर्माण विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियों के अधिकारी शामिल होते हैं। हर बैठक में जाम कम करने, अतिक्रमण हटाने, पार्किंग व्यवस्था सुधारने, सड़कों को व्यवस्थित करने और दुर्घटनाएं रोकने जैसे अनेक निर्णय लिए जाते हैं। लेकिन कुछ दिन बाद हालात फिर वहीं के वहीं नजर आते हैं। सवाल यह है कि आखिर इन बैठकों के निर्णय जमीन पर क्यों नहीं उतरते? जयपुर की सबसे बड़ी समस्या यह है कि ट्रैफिक प्रबंधन कई विभागों में बंटा हुआ है। सड़क किसी विभाग की, अतिक्रमण हटाने की जिम्मेदारी दूसरे विभाग की, पार्किंग तीसरे विभाग के अधीन और ट्रैफिक नियंत्रण पुलिस के पास। ऐसे में निर्णय तो सामूहिक होते हैं, लेकिन जवाबदेही किसी एक की तय नहीं होती। परिणाम यह होता है कि हर विभाग अपनी जिम्मेदारी दूसरे पर डाल देता है।
अतिक्रमण इस समस्या की सबसे बड़ी जड़ है। शहर के प्रमुख बाजारों से लेकर मानसरोवर, सांगानेर, सोडाला, वैशाली नगर, मालवीय नगर और अन्य इलाकों में फुटपाथों पर कब्जा, सड़क तक फैली दुकानें, ठेले और अवैध पार्किंग आम बात है। कई बार अभियान चलाकर अतिक्रमण हटाया जाता है, लेकिन कुछ ही दिनों में वही कब्जे दोबारा हो जाते हैं। यदि कार्रवाई स्थायी नहीं है तो ऐसे अभियान केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। राजनीतिक और स्थानीय दबाव भी कार्रवाई को कमजोर करता है। कई बार अतिक्रमण हटाने वाली टीमों पर जनप्रतिनिधियों या प्रभावशाली लोगों का दबाव आ जाता है। छोटे दुकानदारों पर कार्रवाई होती है, लेकिन बड़े और रसूखदार कब्जाधारियों पर हाथ डालने से प्रशासन बचता है। इससे कानून की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। शहर में पार्किंग की समुचित व्यवस्था का अभाव भी ट्रैफिक जाम का बड़ा कारण है। बाजारों में वाहन सड़क पर ही खड़े कर दिए जाते हैं, जिससे सड़क की चौड़ाई आधी रह जाती है। अवैध पार्किंग के खिलाफ नियमित कार्रवाई नहीं होने से समस्या और बढ़ जाती है।
किसी सड़क पर अतिक्रमण हो, अवैध पार्किंग हो या ट्रैफिक व्यवस्था चरमरा जाए, शायद ही कभी किसी अधिकारी के खिलाफ लापरवाही की कार्रवाई होती हो। विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर अपनी भूमिका से बच निकलते हैं। न किसी की जवाबदेही तय होती है, न किसी पर दंडात्मक कार्रवाई होती है। यह भी देखने में आता है कि अभियान के दौरान छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-ठेला संचालकों या आम लोगों पर कार्रवाई हो जाती है, लेकिन बड़े और प्रभावशाली कब्जाधारियों तक प्रशासन का हाथ नहीं पहुंचता। इससे यह संदेश जाता है कि नियम सभी के लिए समान नहीं हैं। कानून का भय तभी पैदा होगा जब कार्रवाई बिना किसी भेदभाव के हो। यदि किसी अधिकारी को यह भरोसा हो कि लापरवाही के बावजूद न तो उसका तबादला होगा, न विभागीय जांच और न ही किसी प्रकार की जवाबदेही तय होगी, तो फिर सुधार की अपेक्षा करना कठिन है। यही कारण है कि कई निर्णय फाइलों तक सीमित रह जाते हैं और शहर की समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं। इसके अलावा, ट्रैफिक कंट्रोल बोर्ड की बैठकों में लिए गए निर्णयों की नियमित समीक्षा भी नहीं होती। यदि हर निर्णय के लिए समय-सीमा तय हो, जिम्मेदार अधिकारी का नाम सार्वजनिक किया जाए और प्रगति रिपोर्ट अनिवार्य रूप से पेश की जाए, तो जवाबदेही बढ़ेगी।



