साइबर अपराध में तेजी से वृद्धि हो रही है। इसे रोकने के तमाम प्रयास कारगर साबित नहीं हो पा रहे। तकनीक में पिछड़े पुलिसकर्मी हों या फिर व्यवस्था की खामियां, साइबर अपराधी अपने रोजाना बड़ी-बड़ी वारदातें करने में सक्षम नजर आते हैं। साइबर अपराध अब केवल ऑनलाइन ठगी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह आम आदमी की मेहनत की कमाई, व्यापार, सरकारी संस्थानों और कानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। डिजिटल अरेस्ट, फर्जी निवेश, ओटीपी, केवाईसी अपडेट, कस्टमर केयर, सोशल मीडिया हैकिंग और एआई आधारित डीपफेक जैसे नए-नए हथकंडों से ठग हर दिन लोगों को निशाना बना रहे हैं। चिंता की बात यह है कि अपराधी लगातार तकनीक के साथ खुद को अपडेट कर रहे हैं, जबकि सरकारी तंत्र की गति अभी भी अपेक्षाकृत धीमी दिखाई देती है।
राज्य सरकार ने साइबर अपराध रोकने के लिए कई घोषणाएं की हैं। साइबर अपराध नियंत्रण केंद्र की स्थापना, विशेष साइबर अदालतें, आधुनिक तकनीक के उपयोग, साइबर पुलिस को मजबूत करने और जागरूकता अभियान चलाने जैसी योजनाएं सामने आई हैं। हाल ही में एक लाख रुपए या उससे अधिक की साइबर वित्तीय ठगी के मामलों में स्वतः ई-जीरो एफआईआर दर्ज करने का निर्णय भी लिया गया है, ताकि पीड़ितों को तेजी से कानूनी सहायता मिल सके। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन घोषणाओं का असर जमीन पर दिखाई दे रहा है? यदि इंतजाम इतने प्रभावी हैं तो साइबर ठगी के मामले लगातार क्यों बढ़ रहे हैं? आखिर क्यों हर दिन कोई न कोई व्यक्ति अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी गंवा रहा है? कई मामलों में पीड़ितों की शिकायत रहती है कि रकम वापस मिलने की संभावना बेहद कम होती है और जांच लंबी खिंच जाती है।
साइबर अपराध की सबसे बड़ी चुनौती इसकी अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय प्रकृति है। अपराधी फर्जी सिम, किराये के बैंक खाते, वीपीएन और विदेशी सर्वरों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में केवल थाना स्तर की कार्रवाई पर्याप्त नहीं हो सकती। पुलिस, बैंक, टेलीकॉम कंपनियों और केंद्रीय एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में समन्वय आवश्यक है। जागरूकता की कमी भी बड़ी वजह है। आज भी लोग अनजान लिंक पर क्लिक कर देते हैं, वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस या सीबीआई अधिकारी बताने वाले ठगों के झांसे में आ जाते हैं और लालच या डर के कारण अपनी निजी जानकारी साझा कर देते हैं। सरकार को गांव-गांव और शहर-शहर साइबर साक्षरता अभियान को उसी गंभीरता से चलाना होगा, जैसे मतदान या टीकाकरण अभियान चलाए जाते हैं।
साइबर अपराध पर नियंत्रण केवल घोषणाओं से संभव नहीं होगा। इसके लिए प्रशिक्षित साइबर विशेषज्ञों की भर्ती, हर जिले में अत्याधुनिक डिजिटल फॉरेंसिक सुविधाएं, त्वरित जांच, दोषियों को शीघ्र सजा और पीड़ितों को समय पर राहत सुनिश्चित करनी होगी। जब तक अपराधियों में कानून का भय पैदा नहीं होगा और आम नागरिक को त्वरित न्याय नहीं मिलेगा, तब तक साइबर ठगी का यह जाल फैलता ही रहेगा। राजस्थान तेजी से डिजिटल हो रहा है। ऐसे में डिजिटल सुरक्षा भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। अब समय आ गया है कि साइबर अपराध के खिलाफ सरकार केवल घोषणा नहीं, बल्कि परिणाम दिखाए। यही आम जनता की सबसे बड़ी अपेक्षा है। राजस्थान सरकार ने साइबर अपराध पर अंकुश लगाने के लिए कई कदम उठाने की घोषणा की है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता पुलिस बल के व्यापक प्रशिक्षण की है। केवल कुछ विशेषज्ञ अधिकारियों या साइबर थानों के भरोसे पूरे प्रदेश में बढ़ते साइबर अपराध पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है। हर जिले, हर पुलिस थाने और हर जांच अधिकारी को साइबर अपराध की बुनियादी और उन्नत समझ होनी चाहिए।



