Sonam Wangchuk Hunger Strike: सोनम वांगचुक का अनशन गंभीर अवस्था में पहुंच बड़ा मुद्दा बन चुका है। उनकी सेहत लगातार गिर रही है और मामला दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंच गया, जहां न्यायालय ने भी सरकार को उनके स्वास्थ्य की नियमित निगरानी करने तथा आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सकीय हस्तक्षेप सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का नीट पेपर लीक समेत अन्य मुद्दों पर केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर जंतर मंतर पर लंबे समय से आंदोलन चल रहा है। वांगचुक भी इनके समर्थन में आमरण अनशन पर हैं तो वांगचुक के समर्थन में विपक्षी दल के नेताओं के साथ अन्य सेलिब्रिटी भी मैदान पर उतर चुकी हैं। कांग्रेस के पवन खेड़ा, सपा की डिम्पल यादव समेत अनेक नेताओं ने वांगचुक से मिलकर अनशन तोड़ने की अपील तक कर दी पर वे भी जिद पर अड़े हैं, जल्द ही आंदोलकारियों की रैली संसद तक कूच करने वाली है। वहीं दूसरी ओर वांगचुक के साथ सीजेपी के प्रदर्शन-आंदोलन पर तरह-तरह की बातें कर उसे फ्लॉप शो बताया जा रहा है। आंदोलन का परिणाम क्या होगा, यह तो पता नहीं पर संवादहीनता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सरकार की तरफ से आंदोलन को खत्म करने की कोई पहल नहीं हो रही।
हर आंदोलन की अपनी एक सीमा होती है। यदि मांगें लगातार अनसुनी होती रहें, तो आंदोलन या तो कमजोर पड़ जाता है, या फिर अधिक उग्र रूप ले लेता है। दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं हैं। वांगचुक का अनशन अब केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि युवाओं के उस असंतोष का प्रतीक बन गया है जो परीक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सामने आया है। दूसरी ओर, सरकार की प्राथमिकता कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखना है। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच संवाद का अभाव सबसे बड़ी समस्या बनकर उभर रहा है। लोकतंत्र में विरोध को केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यदि लाखों युवाओं की भावनाएं किसी मुद्दे पर एकत्रित हो रही हैं, तो उनका समाधान केवल चुप्पी से नहीं निकलेगा। आंदोलनकारियों को भी यह स्वीकार करना होगा कि किसी मंत्री का इस्तीफा ही हर समस्या का अंतिम समाधान नहीं होता। परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार, पारदर्शी जांच, दोषियों पर कार्रवाई और समयबद्ध सुधार अधिक स्थायी समाधान हो सकते हैं।
आंदोलन में सबसे आसान काम होता है दोष तय कर देना। कठिन काम होता है, उन परिस्थितियों को समझना जिन्होंने आंदोलन को जन्म दिया। सोनम वांगचुक और सीजेपी के आंदोलन को लेकर भी यही स्थिति दिखाई दे रही है। आंदोलन लंबा खिंच रहा है, जंतर-मंतर पर धरना जारी है, अनशन से स्वास्थ्य संकट गहरा रहा है और जनजीवन भी प्रभावित हो रहा है। ऐसे में एक वर्ग पूरे घटनाक्रम का दोष केवल आंदोलनकारियों पर मढ़ने में लगा है। लेकिन क्या वास्तव में पूरी जिम्मेदारी केवल वांगचुक और सीजेपी की है? वांगचुक और सीजेपी को हर समस्या का एकमात्र जिम्मेदार ठहराना न तो न्यायसंगत है और न ही लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित। आंदोलन यदि लंबा चला है तो उसके पीछे संवादहीनता, अविश्वास और समाधान में देरी जैसे कई कारण हैं। दोष तय करने की राजनीति से अधिक आवश्यक है समाधान खोजने की राजनीति। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह विरोध की आवाज़ को सुनने का साहस रखे और आंदोलन भी संवाद के माध्यम से सकारात्मक परिणाम तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करें।
वांगचुक का मानना है कि यदि बिना किसी ठोस आश्वासन या सार्थक प्रगति के वे अनशन समाप्त कर देते हैं, तो आंदोलन का नैतिक और राजनीतिक दबाव कम हो जाएगा। अनशन उनके लिए केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि सरकार का ध्यान आकर्षित करने का अंतिम अहिंसक प्रयास है। इसलिए वे तब तक अनशन जारी रखने की बात करते रहे हैं, जब तक उन्हें यह विश्वास न हो जाए कि उनकी प्रमुख मांगों पर गंभीरता से कार्रवाई होगी। वर्तमान गतिरोध लंबे समय तक जारी रहा तो हालात सचमुच विकट हो सकते हैं। इसलिए समय रहते संवाद, संवेदनशीलता और समझदारी का रास्ता अपनाना ही सबसे उचित होगा। लोकतंत्र में समाधान टकराव से नहीं, विश्वास और वार्ता से निकलता है।



