Rajasthan Pregnant Women Deaths: सरकारी अस्पतालों में पिछले कुछ महीनों के दौरान प्रसूताओं की लगातार हो रही मौतों ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर बार-बार सफाई तो दे रहे हैं पर जनता उससे संतुष्ट नहीं हो पा रही। प्रसूताओं की मौत के बाद अस्पतालों का दौरा कर आवश्यक दिशा-निर्देश से ही सबकुछ सामान्य नहीं होने वाला, इसके लिए कारण तलाश कर उनका इंतजाम करना होगा। एक-दो मौतें हो तो इसे सामान्य माना जा सकता है पर इनकी संख्या अब 20 तक पहुंच गई है, जो यह बताने के लिए काफी है कि प्रसूताओं के स्वास्थ्य को लेकर सरकार गंभीर नहीं है। उस पर मंत्री खींवसर का वायरल वीडियो जख्म पर नमक छिड़कने का काम कर रहा है, जिसमें वो मुस्कुराते हुए कह रहे हैं कि बाकी ब्रेक के बाद। मां हो या नवजात, मौत किसी की भी हो, इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी। इससे यह कहकर भी नहीं बचा सकता कि पहले से राजस्थान की स्थिति मातृ मृत्यु दर से काफी सुधरी है।
दो-ढाई महीने में प्रसूताओं की हो रही मौतों पर जांच समितियां गठित हुई हैं, नमूने लिए गए हैं और कारणों की तलाश जारी है, लेकिन हर नई मौत यह संदेश दे रही है कि समस्या केवल किसी एक डॉक्टर या अस्पताल की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की है। प्रसव आज चिकित्सा विज्ञान की सबसे सामान्य प्रक्रियाओं में गिना जाता है। यदि इसके बाद भी संक्रमण, ऑपरेशन थिएटर की स्वच्छता, दवाओं की गुणवत्ता, उपकरणों की देखरेख और मरीजों की निगरानी जैसे बुनियादी पहलुओं में चूक सामने आती है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि संस्थागत विफलता है। कुछ जांचों में संक्रमण नियंत्रण और ऑपरेशन थिएटर की स्वच्छता को लेकर गंभीर सवाल भी उठे हैं।
यह कहना कि मातृ मृत्यु दर विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के भीतर है, इस समय पर्याप्त उत्तर नहीं हो सकता। आंकड़े कभी भी एक परिवार की त्रासदी का दर्द कम नहीं कर सकते। जनता यह जानना चाहती है कि यदि मौतें एक ही प्रकार की परिस्थितियों में हो रही हैं, तो उनका वास्तविक कारण क्या है और दोषियों पर कार्रवाई कब होगी। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये घटनाएं अलग-अलग जिलों भीलवाड़ा, बांसवाड़ा, बीकानेर, जोधपुर और कोटा में सामने आई हैं। इससे संकेत मिलता है कि समस्या किसी एक अस्पताल तक सीमित नहीं है। यदि ऑपरेशन के बाद संक्रमण, दवाओं की आपूर्ति, उपकरणों की गुणवत्ता या प्रोटोकॉल के पालन में व्यापक खामियां हैं, तो पूरे राज्य के मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रम की स्वतंत्र और समीक्षा आवश्यक है।
अब केवल जांच समितियां बनाना पर्याप्त नहीं होगा। उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए, जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही ऑपरेशन थिएटरों का स्वतंत्र ऑडिट, संक्रमण नियंत्रण प्रणाली की समीक्षा, दवाओं और चिकित्सा सामग्री की गुणवत्ता की जांच तथा चिकित्साकर्मियों के प्रशिक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रत्येक मातृ मृत्यु का मेडिकल ऑडिट केवल कागजी प्रक्रिया न होकर सुधार का आधार बने। राजस्थान ने पिछले वर्षों में मातृ मृत्यु दर कम करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन यदि हाल की घटनाओं से सबक नहीं लिया गया तो वर्षों की उपलब्धियां कुछ महीनों में धूमिल हो सकती हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता का वास्तविक पैमाना नई इमारतें या बजट नहीं, बल्कि यह है कि प्रसूता सुरक्षित घर लौटे और नवजात अपनी मां की गोद में पल सके। इन मौतों को केवल आंकड़ों में बदल देना सबसे बड़ी संवेदनहीनता होगी। हर प्रसूता की मृत्यु एक परिवार का भविष्य छीन लेती है। इसलिए राजस्थान सरकार, स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रशासन की पहली जिम्मेदारी दोष तय करने से पहले जीवन बचाने की होनी चाहिए। क्योंकि मातृत्व किसी भी सभ्य समाज का सबसे सुरक्षित अनुभव होना चाहिए, न कि सबसे बड़ा जोखिम।



