सरकारी स्कूलों में घटते नामांकन से सरकार की बढ़ रही है चुनौती

    सरकारी स्कूलों में लगातार घटता नामांकन सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। दो वर्षों में 9.3 लाख से अधिक विद्यार्थियों की कमी आई, जबकि निजी स्कूलों में नामांकन लगभग स्थिर रहा। खराब आधारभूत सुविधाएं, शिक्षण गुणवत्ता और अभिभावकों का घटता विश्वास इसके प्रमुख कारण हैं। केवल प्रवेशोत्सव से समस्या नहीं सुलझेगी। स्कूलों की सुविधाएं, जवाबदेही और पढ़ाई का स्तर सुधारना होगा।

    0
    184

    सरकारी स्कूलों में नामांकन लगातार गिरता जा रहा है। प्रदेश में पिछले दो शैक्षणिक सत्र के दौरान आठ लाख से अधिक स्कूली विद्यार्थियों की संख्या में कमी आई है। सरकारी विद्यालयों के सामने नामांकन को बनाए रखना सबसे बढ़ी चुनौती के रूप में सामने आ रहा है। नामांकन वर्ष 2023-24 में 1.67 करोड़ से घटकर 2025-26 में 1.59 करोड़ रह गया। इस गिरावट का लगभग पूरा असर सरकारी विद्यालयों में देखने को मिला, जहां 9.3 लाख से अधिक विद्यार्थियों का नामांकन कम हुआ, जबकि निजी विद्यालयों में नामांकन लगभग स्थिर बना रहा।यह गिरावट ऐसे समय में दर्ज की गई, जब इसी अवधि के दौरान राज्य में शिक्षकों की संख्या 7.75 लाख से बढ़कर 7.93 लाख हो गई। ऐसे में यह तो साबित हो ही गया कि सरकारी स्कूलों के मुकाबले निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने में पेरेंट्स प्राथमिकता दे रहे हैं। इसका मूल कारण भी यही है कि जब सरकारी स्कूल के भवन तक ठीक नहीं है तो अन्य सुविधाओं के बेहतर होने की बात कैसे मानी जा सकती है। गिने-चुने स्कूलों को छोड़ दें तो अधिकांश की स्थिति ठीक नहीं हैं। सरकार के प्रयास भी ऊंट के मुंह में जीरे की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं।

    वैसे दावा तो यह भी किया जाता है कि घटती प्रजनन दर के कारण पूरे देशभर के विद्यालयों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या कम हो रही है, राजस्थान भी इससे अछूता नहीं है। बावजूद इसके सरकारी स्कूलों में नामांकन में अपेक्षाकृत अधिक गिरावट यह भी बताती है कि अभिभावक बेहतर शिक्षण परिणाम, सुरक्षित परिसर और अधिक जवाबदेही की अपेक्षा कर रहे हैं। जिम्मेदारों को केवल नामांकन के आंकड़ों पर नजर रखने के बजाय शिक्षण की गुणवत्ता सुधारने, सरकारी विद्यालयों के प्रति लोगों का विश्वास मजबूत करने तथा विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा और रोजगार तक सफलतापूर्वक पहुंचाने पर ध्यान देना चाहिए। स्कूलों में नामांकन को अलग-थलग देखकर नहीं समझा जा सकता। छोटे परिवार, पलायन और रोजगार संबंधी बदलती आकांक्षाएं शिक्षा से जुड़े विकल्पों को प्रभावित कर रही हैं। बड़ा सवाल यह है कि विद्यालय छोड़ने के बाद ये बच्चे कहां जा रहे हैं, उच्च शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण या फिर सीधे काम करने। सबसे अहम बात यह कि लड़कों और लड़कियों दोनों के नामांकन में गिरावट आई है, लेकिन लड़कों में यह कमी अपेक्षाकृत अधिक रही, जो अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक दबावों की ओर भी संकेत करती है।

    राजधानी जयपुर ही नहीं अनेक संभागीय मुख्यालय ही नहीं अन्य जिलों में भी सरकारी स्कूलों में अध्ययन को लेकर रुझान घटता ही जा रहा है। गली-मोहल्लों में खुलते प्राइवेट स्कूल इसकी वजह माने जा सकते हैं तो सरकारी स्कूलों का स्तर नहीं सुधरना भी इसका बड़ा कारण है। पेरेंट्स की धारणा बन गई है कि सरकारी के बजाय प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई अच्छी होती है, इसके अलावा अपना स्टेटस बढ़ाए रखने के लिए भी इसे जरूरी मानते हैं। हालांकि योग्य टीचर सरकारी में हैं, कई प्राइवेट स्कूलों में तो काम-चलाऊ शिक्षक-शिक्षकाएं ही ज्ञान दे रही हैं। इसके बाद भी लोगों की धारणा को बदला नहीं जा सकता। कोरोना काल के दौरान बढ़े नामांकन को बनाए रखने की भी कोई कोशिश नहीं की गई, हालत यह रही कि कोरोना के जाते ही नामांकन अपने-आप घट गया। सरकारी स्कूलों में घटता नामांकन सीधा सरकार के सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है। सरकारी स्कूलों की संख्या तो घट ही रही है, जो बचे हैं उनमें नामांकन कम क्यों हो रहा है, इस पर गंभीरता से मंथन की आवश्यकता है। हर साल प्रवेशोत्सव मना लेने भर से नामांकन नहीं बढ़ने वाला, पहले स्कूलों का स्तर सुधारना होगा। केवल भवन ही नहीं फर्नीचर के साथ अनेक ऐसी सुविधाएं बढ़ानी होगी जिनकी स्टूडेंस को आवश्यकता है या फिर जिनकी वजह से प्राइवेट स्कूलों की तरफ ये ज्यादा आकर्षित होते हैं। सरकारी टीचर्स पर भी अध्ययन की ढिलाई के लिए सख्त होना होगा तो स्कूल का स्तर बढ़ाने के लिए केवल भामाशाह पर ही निर्भर रहने की आदत त्यागनी होगी। सरकार दृढ़ संकल्पित होकर यह सब करे तो नामांकन स्वत: ही बढ़ेगा।

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.