राजस्थान मे ंपर्यटकों की संख्या बेहिसाब बढ़ी है। ऐसा दावा किया जा रहा है कि पिछले तीन साल में चार गुना पर्यटक बढ़े हैं। पर्यटन बढ़ने से सरकार पर्यटन उद्योग के विस्तार और इससे होने वाली कमाई के दावे भी करती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या पर्यटकों की बढ़ती संख्या के अनुरूप पर्यटन स्थलों पर सुविधाएं भी बढ़ी हैं? हकीकत यह है कि कई प्रमुख पर्यटन स्थलों पर आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। कहीं साफ-सफाई की समस्या है तो कहीं शौचालय, पेयजल, पार्किंग और आवागमन की समुचित व्यवस्था नहीं है। पर्यटकों को गाइड, सूचना केंद्र और सुरक्षित परिवहन जैसी सुविधाओं के लिए भी परेशान होना पड़ता है। विडम्बना यह है कि पर्यटन को बढ़ावा देने की योजनाओं में स्थानीय लोगों की भागीदारी भी सीमित नजर आती है। जिन लोगों की पीढ़ियां इन ऐतिहासिक स्थलों, संस्कृति, कला और परम्पराओं को सहेजती आई हैं, उन्हें ही पर्यटन के विकास में अक्सर हाशिए पर रखा जा रहा है। स्थानीय हस्तशिल्पियों, छोटे दुकानदारों, गाइडों, लोक कलाकारों और युवाओं को पर्यटन से जोड़ने के बजाय बड़े कारोबारियों और बाहरी निवेश पर अधिक ध्यान दिया जाता है। पर्यटन स्थलों के आसपास रहने वाले लोगों की समस्याओं का समाधान भी प्राथमिकता में नहीं आता।
पर्यटन से कारोबार और रोजगार की संभावनाएं भी बढ़ी हैं, लेकिन पर्यटकों की बढ़ती संख्या के अनुपात में पर्यटन स्थलों पर सुविधाओं का विस्तार नहीं हो पाया है। जयपुर के हवामहल, आमेर और जलमहल से लेकर उदयपुर की झीलों, जैसलमेर के सोनार किले, जोधपुर के मेहरानगढ़ और माउंट आबू तक कई जगह समस्याएं बनी हुई हैं। कहीं पार्किंग का संकट है तो कहीं शौचालय और पेयजल की पर्याप्त व्यवस्था नहीं। साफ-सफाई, यातायात प्रबंधन, बैठने की जगह और पर्यटक सूचना केंद्रों की कमी भी खलती है। कई ऐतिहासिक स्थलों पर रखरखाव और संरक्षण की जरूरत है।
विडम्बना यह है कि पर्यटन को बढ़ावा देने की योजनाओं में स्थानीय लोगों की भागीदारी भी सीमित नजर आती है। जिन लोगों की पीढ़ियां इन ऐतिहासिक स्थलों, संस्कृति, कला और परम्पराओं को सहेजती आई हैं, उन्हें ही पर्यटन के विकास में अक्सर हाशिए पर रखा जा रहा है। स्थानीय हस्तशिल्पियों, छोटे दुकानदारों, गाइडों, लोक कलाकारों और युवाओं को पर्यटन से जोड़ने के बजाय बड़े कारोबारियों और बाहरी निवेश पर अधिक ध्यान दिया जाता है। पर्यटन स्थलों के आसपास रहने वाले लोगों की समस्याओं का समाधान भी प्राथमिकता में नहीं आता। कई जगह अतिक्रमण, यातायात, पार्किंग और व्यावसायिक गतिविधियों के चलते स्थानीय निवासियों का रोजमर्रा का जीवन प्रभावित होता है। पर्यटन का वास्तविक विकास केवल पर्यटकों की संख्या और पर्यटन से होने वाली आय के आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता। यह भी देखना होगा कि पर्यटकों को कितना अच्छा अनुभव मिला और स्थानीय लोगों की जिंदगी में कितना बदलाव आया। पर्यटन स्थलों की नियमित निगरानी, साफ-सफाई, सुरक्षा, आधारभूत सुविधाओं और विरासत संरक्षण के लिए स्थायी व्यवस्था जरूरी है। स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित गाइड बनाने, हस्तशिल्प और लोककलाओं को बाजार उपलब्ध कराने तथा छोटे कारोबारियों को योजनाओं से जोड़ने की जरूरत है। राजस्थान में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन केवल प्रचार और उत्सवों से पर्यटन उद्योग मजबूत नहीं होगा। सरकार को यह समझना होगा कि स्थानीय लोगों को अलग रखकर पर्यटन का टिकाऊ विकास संभव नहीं है। पर्यटक आएं, प्रदेश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो और स्थानीय लोगों को रोजगार व सम्मान मिले, तभी पर्यटन की सफलता मानी जाएगी। आखिर पर्यटन स्थलों की चमक-दमक के बीच वहां रहने वाले लोगों की जिंदगी अंधेरे में क्यों रहे?
आखिर पर्यटकों की बढ़ती आवक के अनुरूप सुविधाएं बढ़ाने की जिम्मेदारी किसकी है? पर्यटन विभाग, स्थानीय निकाय और जिला प्रशासन एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर कब तक बचते रहेंगे? पर्यटन स्थलों पर अव्यवस्थाओं का असर केवल पर्यटकों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि प्रदेश की छवि भी प्रभावित होती है। पर्यटक यहां अच्छा अनुभव लेकर लौटेगा तभी दोबारा आने और दूसरों को राजस्थान आने की सलाह देने के लिए प्रेरित होगा। केवल पर्यटकों की संख्या गिनकर पर्यटन के विकास का दावा करना पर्याप्त नहीं है।



