जांच बैठाना और मुआवजा बांटना ही पर्याप्त नहीं है…हादसे रोकने का इंतजाम किया जाए

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    झुंझुनूं में सड़क निर्माण के दौरान करंट से ठेकेदार समेत आठ जनों की मौत हो गई जबकि आधा दर्जन झुलस गए। उदयपुरवाटी क्षेत्र के छापोली गांव में यह हादसा हुआ।। सड़क निर्माण के दौरान रोड़ी-बजरी मिलाने वाली मशीन का हाइड्रोलिक जैक ऊपर से गुजर रही 11 हजार वोल्ट की हाईटेंशन लाइन के संपर्क में आ गया। मशीन में करंट फैलने से वहां काम कर रहे मजदूरों को संभलने तक का मौका नहीं मिला।

    यह हादसा एक बार फिर बिजली विभाग की कार्यप्रणाली, सुरक्षा इंतजामों और प्रशासनिक निगरानी पर सवाल खड़े करता है। आखिर ऐसा क्यों है कि बार-बार हाईटेंशन लाइन की चपेट में आने से लोगों की मौत हो जाती है और हादसे के बाद कुछ दिन तक जांच और मुआवजे की बातें करके मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है?  हादसा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि बिजली की हाईटेंशन लाइनों से होने वाली दुर्घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं। कभी खेत में काम करते किसान इसकी चपेट में आ जाते हैं तो कभी निर्माण कार्य में जुटे मजदूरों की जान चली जाती है। कहीं बारात में इस्तेमाल होने वाला वाहन बिजली के तारों से टकरा जाता है तो कहीं ट्रैक्टर-ट्रॉली या क्रेन हादसे की वजह बन जाती है। आखिर बार-बार ऐसी घटनाएं होने के बावजूद सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए जाते?

    हाईटेंशन लाइन के आसपास निर्माण कार्य हो रहा हो तो बिजली विभाग और संबंधित निर्माण एजेंसी की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। मशीनों की ऊंचाई, तारों की स्थिति और सुरक्षित दूरी का आकलन करना जरूरी है। जरूरत पड़ने पर निर्माण कार्य के दौरान बिजली आपूर्ति बंद करवाई जानी चाहिए। लेकिन क्या छापोली में ऐसा किया गया? क्या मशीन को काम पर लगाने से पहले सुरक्षा संबंधी सावधानियां बरती गईं? क्या बिजली विभाग को इस निर्माण कार्य की जानकारी थी? इन सवालों के जवाब जांच में सामने आने चाहिए। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि बिजली आपूर्ति बंद कराने के लिए फोन किया गया, लेकिन जीएसएस पर कर्मचारी मौजूद नहीं था। इस आरोप की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि यह सही है तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि गंभीर जवाबदेही का मामला है।

    सरकार और बिजली विभाग को यह समझना होगा कि हाईटेंशन लाइनें केवल बिजली पहुंचाने का माध्यम नहीं, बल्कि इनके आसपास थोड़ी-सी असावधानी भी जानलेवा साबित हो सकती है। प्रदेशभर में ऐसी लाइनों का सर्वे होना चाहिए। खासकर आबादी क्षेत्रों, खेतों, स्कूलों, सड़कों और निर्माण स्थलों के ऊपर से गुजर रही लाइनों की ऊंचाई और सुरक्षा की जांच होनी चाहिए। जहां तार नीचे लटक रहे हैं या खतरा है, वहां तत्काल सुधार किया जाए। हादसे के बाद जांच के आदेश देना और मृतकों के परिवारों को आर्थिक सहायता देना जरूरी है, लेकिन इससे उन परिवारों का दर्द कम नहीं हो सकता जिन्होंने अपने कमाने वाले सदस्य खो दिए। मुआवजा किसी की जिंदगी का विकल्प नहीं हो सकता। असली जरूरत यह है कि जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक हो, जिम्मेदार अधिकारियों और निर्माण से जुड़े लोगों की जवाबदेही तय हो तथा लापरवाही साबित होने पर सख्त कार्रवाई हो। राजस्थान में पिछले दो वर्षों में हाईटेंशन बिजली लाइनों और करंट से हुए कई हादसे सामने आए हैं। इनमें बच्चे, किसान, मजदूर और एक ही परिवार के सदस्य तक जान गंवा चुके हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि कई घटनाओं में तार टूटकर गिरने, नीचे लटकने या निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा इंतजाम नहीं होने की बात सामने आई।

    तार टूटकर क्यों गिर रहे हैं? बिजली लाइनों के नियमित निरीक्षण और रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है? आबादी और घरों के ऊपर से लाइनें क्यों? मकानों की छतों और सार्वजनिक रास्तों के ऊपर से गुजर रही हाईटेंशन लाइनों को सुरक्षित क्यों नहीं किया जा रहा? किसानों और मजदूरों की सुरक्षा कौन करेगा? खेतों और निर्माण स्थलों पर बिजली लाइनों से होने वाले खतरे के लिए कोई प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं है। शटडाउन की प्रक्रिया कितनी सुरक्षित है? दोषियों पर कार्रवाई का हिसाब कौन देगा? ऐसे  कितने मामलों में जांच पूरी हुई, कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई और कितने परिवारों को मुआवजा मिला? झालावाड़ में दो बच्चों की मौत, नागौर में तीन युवकों की जान जाना, धौलपुर में किसान और मजदूरों की मौत तथा अब झुंझुनूं में आठ मजदूरों की जिंदगी खत्म होना बताता है कि बिजली लाइनों की सुरक्षा को लेकर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। हादसों के बाद मुआवजा बांटना और जांच बैठाना पर्याप्त नहीं है। पूरे राजस्थान में हाईटेंशन लाइनों का सुरक्षा ऑडिट हो और यह सार्वजनिक किया जाए कि कितनी लाइनें खतरे के निशान पर हैं।

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