जयपुर के विद्याधर नगर स्थित मंजीत चिल्ड्रन हॉस्पिटल में 13 साल की बच्ची की मौत और उसके बाद परिजनों का हंगामा निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। मंजीत अस्पताल में बच्ची की मौत हो या कोटा, भीलवाड़ा, उदयपुर और अलवर के अस्पतालों में सामने आए मामले, हर घटना के साथ सब यही कहने लगते हैं कि आखिर इलाज की व्यवस्था में ऐसी चूक क्यों हो रही है? मरीज अस्पताल में जिंदगी बचाने की उम्मीद लेकर पहुंचता है, लेकिन परिजनों को कई बार मौत के बाद जवाब मांगने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
निजी अस्पतालों में महंगा इलाज, सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी और दोनों जगह निगरानी की कमजोर व्यवस्था मरीजों की मुश्किलें बढ़ा रही हैं। अस्पतालों के लाइसेंस जारी करना और सुविधाओं के दावे करना पर्याप्त नहीं है। चिकित्सा विभाग को यह भी देखना होगा कि वास्तव में मरीजों को कैसी सेवाएं मिल रही हैं। राजस्थान में निजी अस्पतालों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। चिकित्सा सुविधाओं के नाम पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं और उपचार की गुणवत्ता की निगरानी कितनी होती है, यह बड़ा सवाल है। अस्पतालों के पंजीकरण और लाइसेंस की जांच के अलावा यह भी देखना जरूरी है कि वहां योग्य डॉक्टर, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ और आपातकालीन उपचार की पर्याप्त व्यवस्था है या नहीं। निजी अस्पतालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बड़े-बड़े भवन, आधुनिक मशीनें और बेहतर इलाज के दावे किए जाते हैं। लेकिन क्या इन दावों की नियमित जांच भी होती है? अस्पतालों के पंजीकरण और लाइसेंस की औपचारिकता पूरी कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। चिकित्सा विभाग की जिम्मेदारी है कि वह अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाओं, डॉक्टरों की योग्यता, नर्सिंग स्टाफ, आपातकालीन सेवाओं और इलाज की गुणवत्ता की नियमित निगरानी करे। विडंबना यह है कि जब कोई मरीज दम तोड़ता है और परिजन हंगामा करते हैं, तभी जांच और कार्रवाई की बातें शुरू होती हैं। क्या विभाग का काम केवल घटनाओं के बाद जांच करवाना है? अस्पतालों का नियमित निरीक्षण क्यों नहीं होता? डॉक्टरों की उपलब्धता, आईसीयू, ऑक्सीजन और आपातकालीन सेवाओं की हकीकत समय रहते क्यों नहीं जांची जाती? चिकित्सा विभाग भी निजी अस्पतालों के खिलाफ एक्शन लेने में पीछे रहता है, इसका कारण आज तक समझ नहीं आया।
पिछले कुछ समय से अस्पतालों में मरीजों की मौत के बाद परिजनों के विरोध और हंगामे की घटनाएं सामने आती रही हैं। कभी गलत इंजेक्शन लगाने के आरोप लगते हैं तो कभी समय पर उपचार नहीं मिलने की शिकायत होती है। कई मामलों में अस्पताल प्रबंधन और परिजनों के बीच विवाद पुलिस तक पहुंच जाता है। सवाल यह है कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आती है? क्या अस्पतालों में मरीजों के परिजनों को उपचार की सही जानकारी नहीं दी जाती? क्या चिकित्सा विभाग निजी अस्पतालों की नियमित निगरानी कर रहा है? निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर भारी रकम वसूली जाती है। इसके बावजूद मरीजों को बेहतर और सुरक्षित उपचार मिलने की गारंटी कौन देगा? केवल लाइसेंस और पंजीकरण के आधार पर अस्पतालों को अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। चिकित्सा विभाग को अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता, उनकी योग्यता, नर्सिंग स्टाफ, आपातकालीन सेवाओं और इलाज की गुणवत्ता की नियमित जांच करनी चाहिए। बच्चों के उपचार में तो विशेष सावधानी की जरूरत होती है। उनकी स्थिति बिगड़ने पर तत्काल चिकित्सकीय निर्णय और विशेषज्ञ उपचार जरूरी है। ऐसे अस्पतालों में संसाधनों और प्रशिक्षित स्टाफ की कमी किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकती। यह भी समझना होगा कि हर मरीज की मौत चिकित्सकीय लापरवाही नहीं होती। लेकिन जहां लापरवाही के आरोप हैं, वहां निष्पक्ष जांच में देरी भी पीड़ित परिवार के साथ अन्याय है। डॉक्टरों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन मरीज के अधिकार और अस्पताल की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। अब सरकार को मौत के बाद मुआवजे और जांच की औपचारिकता से आगे बढ़ना होगा। हर अस्पताल के लिए जवाबदेही तय हो, शिकायतों की सुनवाई समयबद्ध हो और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई सार्वजनिक की जाए। आखिर इलाज का भरोसा ही अस्पतालों की सबसे बड़ी पूंजी है। जब यही भरोसा टूटने लगे तो केवल अस्पतालों की इमारतें और आधुनिक मशीनें बेहतर चिकित्सा व्यवस्था का प्रमाण नहीं हो सकतीं।



