दिवाली की खुशियों में भीगी अवाम, ट्रैफिक बदइंतजामी से परेशान 

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    दिवाली पर बाजार रोशनी बिखेर रहे हैं। खरीदारी जोरों पर है, राजधानी जयपुर ही नहीं पूरे प्रदेश में उत्सव की खुशियां तो दिख रही हैं पर भीड़ के बीच रास्ता जाम अवाम को परेशानी में डाल रहा है। यातायात की व्यवस्था चरमराई हुई है और लोगों को सुविधा के शोर के बीच दुविधा झेलनी पड़ रही है। दिवाली खुशियों और खरीदारी का त्योहार है, लेकिन जयपुर के बाजारों में इस बार भी लोगों को खरीदारी से ज्यादा जाम से जूझना पड़ा। बाजारों में उमड़ी भीड़ के सामने ट्रैफिक व्यवस्था इस कदर बेबस नजर आई कि कई जगह पैदल निकलना तक मुश्किल हो गया। परकोटे के बाजार हों या शहर के दूसरे प्रमुख व्यापारिक क्षेत्र, हर तरफ वाहनों की कतारें, बेतरतीब पार्किंग और रास्तों पर अतिक्रमण ने लोगों की परेशानी बढ़ाई। हैरानी यह है कि दिवाली हर साल आती है, भीड़ भी हर साल बढ़ती है, लेकिन व्यवस्था बनाने वाले विभाग हर बार जैसे नए सिरे से तैयारी करते हैं।

    जब प्रशासन को पहले से मालूम था कि दिवाली पर बाजारों में खरीदारों की भीड़ उमड़ेगी तो ट्रैफिक प्लानिंग जमीन पर क्यों नहीं उतरी? यातायात पुलिस, नगर निगम और जिला प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल क्यों नहीं बन पाया? पार्किंग के लिए पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं हुए? बाजारों के रास्तों पर अस्थायी अतिक्रमण और ठेले-रेहड़ियों को नियंत्रित क्यों नहीं किया गया? जिन रास्तों को नो-पार्किंग और नो-व्हीकल जोन घोषित किया जाता है, वहां नियमों की पालना क्यों नहीं हो पाती? यह समस्या केवल जयपुर तक सीमित नहीं है। प्रदेश के दूसरे बड़े शहरों में भी त्योहारों और विशेष अवसरों पर यही तस्वीर सामने आती है। जोधपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर और बीकानेर जैसे शहरों में भी बाजारों की भीड़ के अनुरूप यातायात और पार्किंग व्यवस्था बनाने की चुनौती बनी हुई है। आखिर हर बार त्योहारों पर सिस्टम की परीक्षा क्यों होती है और हर बार आम आदमी को ही इसका खामियाजा क्यों भुगतना पड़ता है? दरअसल, समस्या केवल वाहनों की बढ़ती संख्या नहीं, बल्कि शहरी प्रबंधन की कमजोरियों की भी है। बाजारों में पार्किंग की जगह नहीं, सड़कों पर अतिक्रमण है, यातायात मार्गों का स्थायी समाधान नहीं और वैकल्पिक रास्तों की जानकारी देने की व्यवस्था भी प्रभावी नहीं। कुछ जगह पुलिसकर्मी तैनात कर देने या वाहनों को दूसरे रास्तों पर मोड़ देने को ही ट्रैफिक प्लानिंग मान लिया जाता है। जबकि जरूरत दीर्घकालीन योजना की है।

    इस अव्यवस्था की एक बड़ी वजह शहरों का अनियोजित विस्तार और बाजारों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। जयपुर के परकोटे के बाजारों में संकरी सड़कें, दुकानों के बाहर सामान, अस्थायी ठेले और बेतरतीब खड़े वाहन यातायात को बाधित करते हैं। पार्किंग की पर्याप्त जगह नहीं होने से लोग सड़कों पर ही वाहन खड़े कर देते हैं। कई जगह फुटपाथों पर कब्जे हैं, ऐसे में पैदल चलने वाले भी सड़क पर उतरने को मजबूर होते हैं। यातायात पुलिस के लिए भी ऐसी स्थिति में व्यवस्था संभालना मुश्किल हो जाता है। लेकिन क्या यह समस्या नई है? वर्षों से इन बाजारों में यही हालात हैं, फिर भी स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाला गया? दूसरी बड़ी वजह विभागों के बीच तालमेल का अभाव है। यातायात पुलिस, नगर निगम, विकास प्राधिकरण और जिला प्रशासन की जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं, लेकिन शहर की यातायात व्यवस्था इन सभी के समन्वय पर निर्भर करती है। अतिक्रमण हटाने की जिम्मेदारी किसी और की, पार्किंग विकसित करने की किसी और की और ट्रैफिक नियंत्रित करने की जिम्मेदारी पुलिस की। नतीजा यह कि आम आदमी एक विभाग से दूसरे विभाग की व्यवस्था के बीच पिसता रहता है। त्योहारों पर अस्थायी इंतजाम तो किए जाते हैं, लेकिन स्थायी समस्याओं को दूर करने की इच्छाशक्ति और निरंतरता नजर नहीं आती। यह भी सच है कि अव्यवस्था के लिए केवल प्रशासन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। लोग भी बाजारों में वाहन लेकर जाते हैं, जहां पहले से भीड़ है। नो-पार्किंग में वाहन खड़े करते हैं, थोड़ी सी दूरी पैदल तय करने से बचते हैं और यातायात नियमों की अनदेखी करते हैं। दुकानदार भी कई बार दुकानों के बाहर सामान फैलाकर रास्ते घेर लेते हैं। जब तक नागरिक और व्यापारी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक प्रशासन की योजनाएं भी पूरी तरह सफल नहीं हो सकतीं।

    जरूरत है कि जयपुर सहित प्रदेश के सभी बड़े शहरों में त्योहारों के लिए स्थायी ट्रैफिक मैनेजमेंट प्लान बनाया जाए। बाजारों के आसपास पर्याप्त पार्किंग, वहां से बाजार तक शटल सेवा, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित रास्ते, निर्धारित नो-व्हीकल जोन और अतिक्रमण पर नियमित कार्रवाई हो। भीड़ वाले इलाकों में रियल टाइम ट्रैफिक मॉनिटरिंग और वैकल्पिक मार्गों की जानकारी भी उपलब्ध कराई जाए। सबसे जरूरी है कि त्योहार खत्म होने के बाद हर साल व्यवस्था की समीक्षा हो और लापरवाही के लिए जिम्मेदारी तय की जाए। आखिर शहरों का विकास केवल चौड़ी सड़कों, फ्लाईओवर और स्मार्ट सिटी के दावों से नहीं मापा जा सकता। असली परीक्षा तब होती है जब लाखों लोग एक साथ बाजारों में निकलते हैं। दिवाली पर हर तरफ जाम और लोगों की परेशानी यह बताने के लिए काफी है कि हमारी शहरी यातायात व्यवस्था अभी भी बढ़ती आबादी और वाहनों के दबाव के अनुरूप तैयार नहीं है।

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