तृणमूल कांग्रेस का बिखराव बढ़ा रहा ममता की मुसीबत

    टीएमसी का मौजूदा संकट केवल एक दल का आंतरिक मामला नहीं है, बल्कि यह उन सभी राजनीतिक दलों के लिए भी एक सीख है जो लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद संगठन की मजबूती और कार्यकर्ताओं की भागीदारी को नजरअंदाज कर देते हैं। सत्ता बनाए रखने से अधिक कठिन काम संगठन को जीवंत और एकजुट बनाए रखना होता है। यही कसौटी अब ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के सामने है।

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    TMC Crisis : पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पूरी तरह बिखर गई है। पहले विधायक और अब सांसद बागी हो गए। ममता बनर्जी के खास रहे पदाधिकारी पार्टी छोड़ रहे हैं। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस के खुद के अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो गया है। इण्डिया गठबंधन की बैठक में ममता बनर्जी ने सोनिया से मुलाकात कर फिर से कांग्रेस में अपनी आस्था जताई तो उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की राहुल गांधी से बातचीत ने भी राजनीतिक हलचल पैदा की है। एक तरह से तो यह भी कहा जा सकता है कि विधानसभा चुनाव से कांग्रेस-इण्डिया गठबंधन से दूरी बनाने वाली ममता को अब अपनी क्षमता का पता लग ही गया। करारी हार के बाद वो यह समझ चुकी हैं कि अकेले रहकर भाजपा-एनडीए को काबू करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है। टीएमसी इन दिनों कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही है। एक समय जिस पार्टी को ममता बनर्जी के मजबूत नेतृत्व और संगठनात्मक पकड़ के कारण अजेय माना जाता था, वहीं अब उसके भीतर असंतोष, नेताओं के पलायन और विवादों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या टीएमसी का यह बिखराव मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ाने वाला है?

    टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत उसकी जमीनी संगठन क्षमता रही है, लेकिन लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण पार्टी के भीतर गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर असहमति भी बढ़ी है। कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, कुछ को जांच एजेंसियों का सामना करना पड़ा और कुछ नेता पार्टी से दूरी बनाते नजर आए। इससे विपक्ष को सरकार और पार्टी दोनों पर हमले का अवसर मिला है। राजनीति में यह स्थापित सत्य है कि जब किसी दल में संवाद की कमी और व्यक्तिवाद हावी होने लगता है, तब संगठन कमजोर पड़ने लगता है। टीएमसी के सामने भी यही चुनौती दिखाई देती है। पार्टी नेतृत्व को यह समझना होगा कि केवल करिश्माई नेतृत्व के भरोसे लंबे समय तक संगठन को एकजुट नहीं रखा जा सकता। कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की भावनाओं को महत्व देना भी उतना ही आवश्यक है। हालांकि यह भी सच है कि ममता बनर्जी अभी भी पश्चिम बंगाल की सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिनी जाती हैं और उनकी जनाधार क्षमता को कम करके नहीं आंका जा सकता। लेकिन विपक्ष की बढ़ती सक्रियता, पार्टी के भीतर असंतोष और लगातार उठते विवाद आने वाले समय में उनकी राह को कठिन जरूर बना सकते हैं।

    लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल की वास्तविक शक्ति उसके संगठन, आंतरिक लोकतंत्र और जनता के विश्वास में निहित होती है। यदि टीएमसी समय रहते आत्ममंथन कर संगठनात्मक कमजोरियों को दूर नहीं करती, तो इसका असर आगामी चुनावी प्रदर्शन पर पड़ सकता है। वहीं यदि ममता बनर्जी असंतुष्ट नेताओं को साथ लेकर पार्टी में अनुशासन और संवाद का संतुलन स्थापित करने में सफल रहती हैं, तो वह इन चुनौतियों को अवसर में भी बदल सकती हैं। टीएमसी का मौजूदा संकट केवल एक दल का आंतरिक मामला नहीं है, बल्कि यह उन सभी राजनीतिक दलों के लिए भी एक सीख है जो लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद संगठन की मजबूती और कार्यकर्ताओं की भागीदारी को नजरअंदाज कर देते हैं। सत्ता बनाए रखने से अधिक कठिन काम संगठन को जीवंत और एकजुट बनाए रखना होता है। यही कसौटी अब ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के सामने है। ऐसे में कांग्रेस-इण्डिया गठबंधन से टीएमसी की नजदीकी उसे मजबूत बनाएगी। यह भी सही है कि ममता बनर्जी के वे ही साथी साथ छोड़ रहे हैं जो उनके खास माने जाते थे, ऐसे में ममता को मजबूती से पार्टी को फिर से खड़ा करना होगा।

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