जवाबदेही तय नहीं होगी तो ऐसे ही हादसे लेते रहेंगे लोगों की जानें

    जयपुर के खोह नागोरियान में अवैध पटाखा फैक्ट्री विस्फोट में 8 लोगों की मौत ने प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे हादसों के बाद जांच और कार्रवाई के दावे तो होते हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे दोहराए जाते रहेंगे और निर्दोष लोग इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाते रहेंगे।

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    पटाखे की अवैध ‘फैक्ट्री’ ने आठ लोगों की जान ले ली। करीब आधा दर्जन एसएमएस अस्पताल में भर्ती है। जयपुर के खोह नागोरियान में अब इस हादसे की जांच का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि दोषी कोई भी हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा। विधायक अमीन कागजी भी अब आरोप लगा रहे हैं कि यह मिलीभगत का खेल था। हर बड़े हादसे के बाद प्रशासन सक्रिय होता है, जांच समितियां गठित होती हैं, अधिकारियों से जवाब-तलब होता है और सख्त कार्रवाई के दावे किए जाते हैं। लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। अभी चार माह पहले अलवर के भिवाड़ी में भी ऐसे ही पटाखे की फैक्ट्री में सात जनों की मौत हुई थी। यह कोई एक-दो हादसे नहीं, प्रदेश में आए दिन ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। दुर्भाग्य यह है कि हर दुर्घटना के बाद चर्चा मृतकों की संख्या और मुआवजे तक सिमट जाती है। हादसे के मूल कारणों पर गंभीरता से काम नहीं होता। न तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होती है और न ही ऐसी व्यवस्था बनाई जाती है जिससे भविष्य में घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या पुलिस, प्रशासन और स्थानीय लोगों को वास्तव में इसकी जानकारी नहीं थी? जिस जगह बड़ी मात्रा में विस्फोटक सामग्री का भंडारण और निर्माण कार्य हो रहा हो, वहां आवाजाही, माल की ढुलाई और गतिविधियां सामान्य नहीं हो सकतीं। ऐसे में यह मान लेना कठिन है कि किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी होगी।

    रिहायशी इलाकों और घनी आबादी वाले मोहल्लों में पटाखों का निर्माण, भंडारण और पैकिंग का काम कोई एक-दो दिन में शुरू नहीं हो जाता। इसके लिए कच्चे माल की आवाजाही होती है, तैयार माल बाहर भेजा जाता है और लगातार लोगों का आना-जाना लगा रहता है। ऐसे में सब अनजान बने रहें तो भी दाल में कुछ काला नजर आता है। हैरानी की बात यह है कि अधिकांश हादसों के बाद पता चलता है कि अवैध फैक्ट्री या गोदाम लंबे समय से संचालित हो रहे थे। यानी खतरा पहले से मौजूद था, लेकिन कार्रवाई तब हुई जब कोई बड़ा हादसा हो गया। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि या तो निगरानी व्यवस्था पूरी तरह नाकाम है या फिर कहीं न कहीं लापरवाही और मिलीभगत ने ऐसे कारोबार को संरक्षण दे रखा है। पटाखों और विस्फोटक सामग्री का काम अत्यंत संवेदनशील होता है। इसके लिए लाइसेंस, सुरक्षा मानकों और निर्धारित स्थानों का पालन अनिवार्य है। इसके बावजूद यदि घरों और मोहल्लों में यह कारोबार फल-फूल रहा है, तो यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं बल्कि हजारों लोगों की जान को जोखिम में डालने जैसा है। एक छोटी सी चूक पूरे इलाके को तबाही में बदल सकती है।

    दिवाली पर लगने वाली पटाखों की असंख्य दुकानों के बीच लाइसेंस तो बंट जाते हैं पर वहां की स्थिति क्या है, इस पर कोई ध्यान नहीं देता। अग्निशमन जैसे तमाम मापदण्ड की अनदेखी के बावजूद यह कारोबार प्रशासन की मौन स्वीकृति के बीच जारी रहता है। ऐसे में हादसे के लिए सिर्फ एक को जिम्मेदार ठहराया जाना भी गलत है। खोह नागोरियान में चल रही पटाखा फैक्ट्री की संबंधित विभागों को जानकारी नहीं थी तो यह उनकी कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़ा करता है। और यदि जानकारी थी, फिर भी कार्रवाई नहीं हुई, तो मामला और भी गंभीर है। दोनों ही स्थितियां प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करती हैं। आखिर नियमित निरीक्षण, खुफिया सूचना तंत्र और स्थानीय पुलिस की निगरानी व्यवस्था किसलिए है? स्थानीय लोगों की भी एक सामाजिक जिम्मेदारी होती है। कई बार लोग भय, दबाव या उदासीनता के कारण शिकायत नहीं करते। हालांकि यह भी सच है कि अवैध गतिविधियों की सूचना देने वालों को पर्याप्त सुरक्षा और भरोसा नहीं मिल पाता। ऐसे में प्रशासन को ऐसा माहौल बनाना होगा जहां लोग बिना डर के शिकायत दर्ज करा सकें। यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि इतने समय तक अवैध कारोबार कैसे चलता रहा, किसने आंखें मूंदी रखीं और किन अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती थी। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे दोहराए जाते रहेंगे और निर्दोष लोग इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाते रहेंगे।

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