मणिपुर: हिंसा तब ही थमेगी जब बढ़ेगा सामाजिक भरोसा

    मणिपुर में नई सरकार बनने के बाद भी हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। हालिया हत्याओं और आगजनी की घटनाओं ने प्रशासन पर लोगों का भरोसा कमजोर किया है। समस्या की जड़ समुदायों के बीच गहराता अविश्वास, कमजोर खुफिया तंत्र और अवैध हथियार हैं। स्थायी शांति के लिए सभी पक्षों के बीच निष्पक्ष संवाद, हथियारों की बरामदगी, सख्त कार्रवाई और विस्थापितों के पुनर्वास की आवश्यकता है। मणिपुर में हिंसा तभी रुकेगी जब भय की जगह विश्वास का माहौल बनेगा।

    0
    27

    Manipur Violence: मणिपुर में कमजोंग जिले के एक गांव में फिर हिंसा हुई। हमलावरों ने दो जनों की हत्या कर दी और कई घरों को जला दिया। उधर छह नागा बंधकों के शव मिलने के बाद माहौल और गर्मा गया है। परिजनों ने हत्यारों की गिरफ्तारी तक शव लेने से मना कर दिया है। परिजनों ने यह भी कहा कि उन्हें सरकार पर भरोसा नहीं रहा। राष्ट्रपति शासन की अवधि समाप्त होने और नई सरकार के गठन के बाद यह उम्मीद जगी थी कि राज्य धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर लौटेगा, लेकिन ताजा घटनाओं ने साबित कर दिया कि हालात अभी भी नियंत्रण से दूर हैं। कमजोंग जिले में दो लोगों की हत्या, घरों को आग के हवाले किए जाने और उससे पहले छह नागा लोगों के शव बरामद होने की घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की तमाम कोशिशों के बावजूद शांति क्यों स्थापित नहीं हो पा रही है। मणिपुर पिछले तीन वर्षों से जातीय तनाव और अविश्वास की आग में झुलस रहा है। नई सरकार के गठन को राजनीतिक समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया था, लेकिन केवल सत्ता परिवर्तन से जमीनी समस्याओं का समाधान नहीं होता। जब तक सभी समुदायों के बीच विश्वास बहाली नहीं होगी और निष्पक्ष संवाद की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी, तब तक हिंसा की यह श्रृंखला टूटना मुश्किल है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि नई सरकार को एक ऐसे समाज की जिम्मेदारी मिली है जो भौगोलिक और मानसिक रूप से विभाजित हो चुका है। सबसे चिंता की बात यह है कि हजारों लोग अब भी राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। विस्थापन, भय और असुरक्षा का माहौल बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के भविष्य पर असर डाल रहा है। सरकार पुनर्वास और सुरक्षा के दावे कर रही है, लेकिन जब आए दिन नई हिंसा की खबरें सामने आती हैं तो उन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

    बार-बार होती हिंसा की सबसे बड़ी वजह है समुदायों के बीच गहराता अविश्वास। लंबे समय से चले आ रहे जातीय तनाव ने समाज को दो हिस्सों में बांट दिया है। जब लोगों का भरोसा प्रशासन और एक-दूसरे पर कमजोर पड़ जाता है तो छोटी घटनाएं भी बड़े टकराव का रूप ले लेती हैं। ऐसे माहौल में केवल पुलिस बल बढ़ा देना पर्याप्त नहीं होता। खुफिया तंत्र और स्थानीय स्तर पर समन्वय की कमी है। यदि संवेदनशील इलाकों में समय रहते तनाव की जानकारी मिले और तत्काल कार्रवाई हो तो कई घटनाओं को रोका जा सकता है। लेकिन बार-बार हो रही हिंसा यह संकेत देती है कि कहीं न कहीं सूचनाओं के संकलन और उन पर त्वरित कार्रवाई में कमी रह जाती है। अवैध हथियारों की उपलब्धता है। हिंसा के दौरान बड़ी संख्या में हथियार लूटे गए थे और माना जाता है कि अब भी कई हथियार लोगों के पास हैं। जब तक इन हथियारों की प्रभावी बरामदगी नहीं होगी, तब तक शांति प्रयासों को बार-बार झटका लगता रहेगा।

    स्थिति सुधारने के लिए सरकार को बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। सबसे पहले सभी समुदायों के प्रतिनिधियों के साथ लगातार और निष्पक्ष संवाद की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। केवल औपचारिक बैठकों से काम नहीं चलेगा, बल्कि विश्वास बहाली के ठोस कदम उठाने होंगे। दूसरा, खुफिया तंत्र को मजबूत कर संवेदनशील क्षेत्रों में सामुदायिक पुलिसिंग को बढ़ावा देना होगा ताकि स्थानीय लोगों का सहयोग मिल सके। इसके साथ ही अवैध हथियारों की व्यापक तलाशी और बरामदगी अभियान चलाना होगा। हिंसा फैलाने वाले तत्वों के खिलाफ बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक दबाव के निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। राहत शिविरों में रह रहे विस्थापित परिवारों के पुनर्वास, शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि असुरक्षा और उपेक्षा नई नाराजगी को जन्म देती है। मणिपुर की समस्या केवल कानून-व्यवस्था का संकट नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास के टूटने का परिणाम भी है। प्रशासन की सफलता केवल हिंसा रोकने से नहीं, बल्कि लोगों के मन से भय दूर करने से तय होगी। हिंसा भी तभी रुकेगी जब लोगों के मन में भय के बजाय विश्वास पैदा होगा।

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.