Ahmedabad Plane Crash: अहमदाबाद विमान हादसे की जांच रिपोर्ट 11 माह गुजरने के बाद भी नहीं आ पाई है। केन्द्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू किंजारापु ने फिर कह दिया है कि यह रिपोर्ट जल्द ही आ जाएगी। संभवतया यह पहले भी हुआ है, हादसा होने के तुरंत बाद कई मंत्री-अफसर घूम-घूम कर कहते रहे, जल्द जांच में आ जाएगा हादसे का कारण। तकरीबन एक साल होने जा रहे हैं, अभी तक जांच के नाम पर सरकारी तौर पर कुछ भी स्पष्ट नहीं किया गया है। गौरतलब है कि पिछले साल जून में हुए इस हादसे में करीब 270 लोगों की मौत हुई थी। पीड़ित परिवारों का दर्द अब भी वैसा ही ताजा है। जिन लोगों ने अपने बेटे, बेटी, माता-पिता या जीवनसाथी खोए, उनके लिए समय आगे बढ़ा जरूर है, मगर जिंदगी वहीं ठहर गई है। सबसे बड़ी पीड़ा इस बात की है कि अब तक हादसे की अंतिम जांच रिपोर्ट सामने नहीं आ सकी। परिवारों को लगने लगा है कि जांच की रफ्तार उनके जख्मों पर मरहम लगाने के बजाय उन्हें और गहरा कर रही है।
हर बड़े हादसे के बाद सरकारें संवेदना जताती हैं, मुआवजे का ऐलान होता है और उच्च स्तरीय जांच बैठा दी जाती है। लेकिन पीड़ित परिवारों को केवल आर्थिक सहायता नहीं चाहिए, उन्हें जवाब चाहिए-आखिर उनके अपनों की मौत का जिम्मेदार कौन था? क्या यह तकनीकी खामी थी, मानवीय भूल थी या सुरक्षा मानकों की अनदेखी? जब महीनों तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता तो लोगों का भरोसा व्यवस्था से उठने लगता है। जांच एजेंसियां तकनीकी जटिलताओं और अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं का हवाला दे रही हैं। यह सही भी हो सकता है कि विमान हादसों की जांच में ब्लैक बॉक्स, इंजन डेटा, एयर ट्रैफिक रिकॉर्ड और विशेषज्ञ विश्लेषण में लंबा समय लगता है। लेकिन पीड़ित परिवारों का सवाल भी गलत नहीं है कि क्या भारत में किसी भी बड़ी त्रासदी की जांच तय समयसीमा में पूरी नहीं हो सकती? आखिर हर बार रिपोर्ट आने में इतनी देरी क्यों होती है? देश में कोई बड़ा हादसा हो, घोटाला सामने आए या जनहानि की त्रासदी घटे-शुरुआत में प्रशासन और सरकार पूरी सक्रियता दिखाते हैं। जांच समिति बनती है, बड़े-बड़े बयान आते हैं, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया जाता है। लेकिन कुछ समय बाद वही जांच धीमी पड़ जाती है और पीड़ित परिवार इंतजार करते रह जाते हैं। सवाल यह है कि आखिर भारत में अधिकांश जांचें इतनी लंबी और सुस्त क्यों हो जाती हैं?
सबसे बड़ी समस्या जवाबदेही की कमी है। जांच एजेंसियों पर समयसीमा का वास्तविक दबाव कम दिखाई देता है। रिपोर्ट देर से आए तो शायद ही किसी अधिकारी से पूछा जाता हो कि देरी क्यों हुई। जब व्यवस्था में देरी की कोई सजा नहीं होती, तब जांच फाइलों और प्रक्रियाओं में उलझकर रह जाती है। तंत्र की जटिल कार्यशैली है। एक ही मामले में कई विभाग जुड़ जाते हैं-पुलिस, फॉरेंसिक, तकनीकी विशेषज्ञ, प्रशासनिक इकाइयां और कभी-कभी केंद्रीय एजेंसियां भी। समन्वय की कमी और कागजी प्रक्रिया जांच को महीनों नहीं, कई बार वर्षों तक खींच देती है। आम लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर सच तक पहुंचने में इतना समय क्यों लग रहा है। कई मामलों में राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव भी जांच की गति प्रभावित करते हैं। यदि हादसे या लापरवाही की आंच किसी प्रभावशाली व्यक्ति, विभाग या संस्था तक पहुंचती हो, तो जांच की धार कमजोर पड़ती नजर आती है। छोटी कार्रवाई जल्दी हो जाती है, लेकिन बड़े स्तर की जवाबदेही अक्सर टलती रहती है। यही वजह है कि जनता के मन में यह धारणा बनती जा रही है कि जांच सच खोजने से ज्यादा समय बिताने का माध्यम बन गई है। सबसे दुखद पहलू यह है कि जांच करने वाले तंत्र कई बार पीड़ित परिवारों की मानसिक स्थिति को समझ ही नहीं पाते। जिन परिवारों ने अपने प्रियजन खोए हों, उनके लिए हर दिन भारी होता है। उन्हें केवल तकनीकी रिपोर्ट नहीं चाहिए, बल्कि यह भरोसा चाहिए कि व्यवस्था उनकी पीड़ा को गंभीरता से समझ रही है। लेकिन जब महीनों तक सिर्फ “जांच जारी है” सुनने को मिले, तो पीड़ा के साथ गुस्सा और अविश्वास भी बढ़ने लगता है। जरूरत इस बात की है कि देश में हर बड़ी जांच के लिए स्पष्ट समयसीमा तय हो। जांच एजेंसियों को नियमित सार्वजनिक अपडेट देना अनिवार्य किया जाए और अनावश्यक देरी पर अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हो। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि समय पर दिखाई भी देना चाहिए। क्योंकि देर से मिला सच कई बार पीड़ितों के जख्म और गहरे कर देता है। जिम्मेदार



