बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी कामकाजी पत्नी से घर के खर्चों में अपना वेतन लगाने के लिए कहना अपने आप में गैरकानूनी मांग या वैवाहिक क्रूरता नहीं माना जा सकता. यह फैसला जस्टिस वृषाली जोशी ने सुनाया. अदालत ने नागपुर के एक व्यक्ति और उसके माता-पिता के खिलाफ दर्ज FIR और चार्जशीट को रद्द कर दिया. उनके खिलाफ IPC की धारा 498A और आईपीसी की धारा 504 के तहत मामला दर्ज किया गया था.
क्या है पूरा मामला ?
मामला मानकापुर पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था. शिकायतकर्ता पत्नी, जो एक सरकारी कर्मचारी है, ने आरोप लगाया था कि उस पर अपना वेतन परिवार को सौंपने का दबाव बनाया जाता था क्योंकि वह कथित तौर पर घर का काम नहीं करती थी. हालांकि, अदालत ने मामले से जुड़े आरोपों और उपलब्ध सबूतों की जांच के बाद कहा कि इन परिस्थितियों से वैवाहिक कानून के तहत “क्रूरता” के आवश्यक तत्व साबित नहीं होते हैं.
कोर्ट की तरफ से फैसले में कही गई ये बात
वृषाली जोशी ने अपने आदेश में माना कि वैवाहिक संबंधों में घरेलू खर्चों में आर्थिक योगदान को लेकर चर्चा या अपेक्षा को स्वतः अपराध नहीं माना जा सकता. अदालत ने यह भी कहा कि यह मामला वैवाहिक रिश्तों में तनाव और मतभेद बढ़ने के बाद दर्ज की गई शिकायत का परिणाम प्रतीत होता है.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि पत्नी से घर के खर्चों में सहयोग की अपेक्षा की गई, उसे IPC की धारा 498-A के तहत क्रूरता नहीं कहा जा सकता, जब तक कि इसके साथ गंभीर उत्पीड़न या गैरकानूनी मांग के स्पष्ट सबूत मौजूद न हों. इस फैसले को वैवाहिक विवादों और घरेलू मामलों से जुड़े कानूनों की व्याख्या के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
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