ढाका: पड़ोसी देश बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। सत्ताधारी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर देश के 23वें राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं। गुरुवार को जातीय संसद (संसद भवन) में दोपहर 2 बजे से शाम 5 बजे तक चले गुप्त मतदान प्रक्रिया के बाद घोषित नतीजों में मिर्जा फखरुल ने विपक्षी गठबंधन के उम्मीदवार कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद को 167 वोटों के भारी अंतर से शिकस्त दी।
चुनाव परिणाम सामने आते ही देश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने मिर्जा फखरुल को लाल गुलाब का गुलदस्ता भेंट कर आधिकारिक रूप से शुभकामनाएं दीं और उन्हें गले लगाकर बधाई दी। आधिकारिक घोषणा के अनुसार, मिर्जा फखरुल 21 अगस्त की शाम ‘बंगभवन’ (राष्ट्रपति भवन) में आयोजित होने वाले भव्य समारोह में राष्ट्रपति पद की गोपनीयता की शपथ लेंगे।
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संसदीय वोटिंग का आंकड़ा: 167 वोटों से जीती जंग
350 सदस्यों वाली बांग्लादेशी संसद में वर्तमान में 349 सदस्य ही वोट डालने के पात्र थे, क्योंकि चटगांव-4 की एक संसदीय सीट न्यायिक आदेश के बाद रिक्त घोषित की गई थी। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ए.एम.एम. नासिर उद्दीन द्वारा जारी अधिकृत नतीजों के अनुसार:
- मिर्जा फखरुल इस्लाम (BNP): 255 वोट मिले।
- कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद (विपक्षी 11 दलीय गठबंधन): 88 वोट मिले।
‘सांसदों को नहीं थी वोट की आजादी’: विपक्षी उम्मीदवार के आरोप
चुनाव हारने के बाद 11 दलों के मुख्य विपक्षी गठबंधन ‘जमात-ए-इस्लामी’ समर्थित प्रत्याशी कर्नल ओली अहमद ने पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। ढाका में संवाददाताओं से बात करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि बांग्लादेश में लोकतंत्र पूरी तरह से नियंत्रित है और यह नतीजा पहले से ही तय था।
अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 70 (Article 70) का विशेष रूप से उल्लेख किया। इस नियम के तहत कोई भी सांसद अपनी पार्टी की आधिकारिक लाइन के खिलाफ जाकर वोट नहीं डाल सकता, वरना उसकी संसद सदस्यता तत्काल समाप्त हो जाती है। उनका तर्क था कि इस बाध्यता के कारण कई सांसद अपनी अंतरात्मा की आवाज पर स्वतंत्र रूप से मतदान नहीं कर सके।
35 साल बाद क्यों हुआ राष्ट्रपति पद के लिए मुकाबला?
बांग्लादेशी संविधान की व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं, बल्कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों (सांसदों) के जरिए होता है। बांग्लादेश में 1991 के बाद से यह पहला मौका है जब राष्ट्रपति पद के लिए संसद में वोटिंग की नौबत आई।
वर्ष 1996 से लेकर 2023 के बीच जितने भी राष्ट्रपति चुने गए, वे सभी निर्विरोध निर्वाचित हुए थे। इसका मुख्य कारण यह था कि संसद में सत्ताधारी दल के पास पूर्ण बहुमत होने के कारण विपक्षी दल निश्चित हार के डर से अपना कोई उम्मीदवार ही मैदान में नहीं उतारते थे। हालांकि, इस बार 11 विपक्षी दलों के गठबंधन ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी ताकत दिखाने और गठबंधन को एकजुट रखने की रणनीति के तहत अपना प्रत्याशी मैदान में उतारा था।
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पूर्व राष्ट्रपति के इस्तीफे से खाली हुआ था पद
बांग्लादेश में इस आकस्मिक चुनाव की स्थिति पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के अचानक पद छोड़ने के बाद बनी। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के बेहद करीबी माने जाने वाले 76 वर्षीय शहाबुद्दीन ने बीते महीने 24 जुलाई को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला देते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। उनका कार्यकाल 2028 तक चलना था, लेकिन उनके इस्तीफे के बाद संवैधानिक संकट से बचने के लिए तुरंत नए राष्ट्रपति का चुनाव संपन्न कराया गया। मिर्जा फखरुल के राष्ट्रपति बनने से अब देश में बीएनपी की सरकार और राष्ट्रप्रमुख के बीच बेहतर तालमेल रहने की उम्मीद जताई जा रही है।



