नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी भारी तनाव और युद्ध के माहौल के बीच इजराइल की घरेलू राजनीति में बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। देश में 27 अक्टूबर को होने वाले आम चुनावों से ठीक दो महीने पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक जमीन खिसकती नजर आ रही है। हाल ही में सामने आए ताजा ओपिनियन पोल (सर्वे) के आंकड़ों ने इजराइली राजनीति में तहलका मचा दिया है। देश के पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट अब नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं।
नए सर्वे ने बढ़ाई नेतन्याहू की चिंता
‘जमान इजराइल’ द्वारा जारी नए चुनावी सर्वे के अनुसार, अगर आज इजराइल में चुनाव होते हैं तो पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट की अगुवाई वाली विपक्षी पार्टी ‘यशार’ को 25 सीटें मिल सकती हैं। वहीं दूसरी तरफ, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ताधारी ‘लिकुड पार्टी’ महज 21 सीटों पर सिमटती दिख रही है।
यानी यशार पार्टी ने नेतन्याहू की लिकुड पार्टी पर सीधे 4 सीटों की बढ़त बना ली है। गौर करने वाली बात यह है कि पिछले कुछ हफ्तों से आ रहे लगातार सर्वे में दोनों पार्टियों के बीच कड़ा मुकाबला देखा जा रहा था, जहाँ लिकुड या तो बराबरी पर थी या 1-2 सीटों से पीछे चल रही थी। लेकिन चुनाव की तारीख नजदीक आते ही यह अंतर बढ़कर 4 सीटों का हो गया है, जो नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं।
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120 सीटों वाली संसद में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं
हालांकि, सर्वे में यशार पार्टी भले ही सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरती दिख रही हो, लेकिन चुनाव के बाद इजराइल में सरकार बनाना इतना आसान नहीं होगा। इजराइल की 120 सीटों वाली संसद (नेसेट) में सरकार बनाने या बहुमत हासिल करने के लिए कम से कम 61 सीटों का आंकड़ा छूना अनिवार्य होता है।
आंकड़ों के गणित को समझें तो:
- चेंज ब्लॉक (नेतन्याहू विरोधी गठबंधन): 58 सीटें (बहुमत के आंकड़े 61 से 3 सीट दूर)
- नेतन्याहू समर्थक खेमा: 50 सीटें
- अरब पार्टियां (राम और हदाश-ताल): 12 सीटें (6-6 सीटें प्रत्येक)
यह आंकड़ा साफ दर्शाता है कि चुनाव के बाद भी इजराइल में त्रिशंकु संसद जैसी स्थिति बन सकती है और किसी भी बड़े खेमे के पास आसानी से अकेले दम पर सरकार बनाने लायक स्पष्ट बहुमत नहीं दिख रहा है।
प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर खींचतान
गादी आइजेनकोट की बढ़ती लोकप्रियता के बीच विरोधी खेमे में भी प्रधानमंत्री पद को लेकर अंदरूनी खींचतान शुरू हो गई है। विपक्षी नेता याइर लैपिड की पार्टी ‘बीयाचद’ ने यह तो साफ कर दिया है कि वे विपक्षी सरकार बनने की राह में कोई रोड़ा नहीं अटकाएंगे, लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या वे आइजेनकोट को प्रधानमंत्री बनाएंगे, तो उन्होंने गोलमोल जवाब दिया।
बीयाचद में पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी एक मुख्य चेहरा हैं और वे खुद को भी पीएम पद का दावेदार मानते हैं। इस बीच आइजेनकोट का मानना है कि चुनाव के बाद उसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री की कुर्सी मिलनी चाहिए जिसकी पार्टी नेतन्याहू विरोधी खेमे में सबसे ज्यादा सीटें जीतकर आई हो। उनका यह बयान 2021-2022 के उस दौर की ओर इशारा करता है जब महज 7 सीटों वाले नफ्ताली बेनेट गठबंधन के सहारे पीएम बन गए थे।
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ईरानी खतरे के बीच आइजेनकोट की सुरक्षा पर संशय
राजनीतिक सरगर्मियों के बीच सुरक्षा एजेंसियों की चिंता भी बढ़ गई है। चैनल 12 की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी खुफिया एजेंसियों द्वारा इजराइली नेताओं को निशाना बनाने के इनपुट्स मिले हैं। जहाँ वर्तमान प्रधानमंत्री नेतन्याहू को राष्ट्रपति स्तर की अभेद्य सुरक्षा प्राप्त है, वहीं गादी आइजेनकोट के पास फिलहाल कोई औपचारिक सरकारी सुरक्षा कवच नहीं है।
उनकी तेजी से बढ़ती राजनीतिक ताकत और ईरान के खतरे को देखते हुए इजराइल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी ‘शिन बेट’ (Shin Bet) अब चुनाव प्रचार के दौरान आइजेनकोट को विशेष सशस्त्र सुरक्षा मुहैया कराने पर गंभीरता से विचार कर रही है।
कैसे होता है इजराइल में चुनाव?
भारत या अमेरिका से इतर, इजराइल में जनता सीधे किसी उम्मीदवार या प्रधानमंत्री पद के चेहरे को वोट नहीं देती। पूरा इजराइल एक ही चुनाव क्षेत्र माना जाता है और नागरिक अपनी पसंद की राजनीतिक पार्टी को वोट डालते हैं।
वोट प्रतिशत के आधार पर 120 सीटों वाली नेसेट में पार्टियों को अनुपात में सीटें दी जाती हैं। चुनाव नतीजे आने के बाद, राष्ट्रपति उस नेता को सरकार बनाने का न्योता देते हैं जो 61 या उससे अधिक सांसदों का समर्थन जुटाने में कामयाब होता है। यही वजह है कि इजराइल में सबसे ज्यादा सीटें पाने वाली पार्टी का नेता ही पीएम बने, यह बिल्कुल भी जरूरी नहीं होता। अब देखना दिलचस्प होगा कि 27 अक्टूबर को इजराइली जनता किस पर अपना भरोसा जताती है।



