मुंबई (प्रज्ञा पांडे)। हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार विलेन अमजद खान को लोग आज भी ‘गब्बर सिंह’ के नाम से याद करते हैं। लेकिन जिस अभिनेता की आवाज और अदाकारी ने इतिहास रच दिया, उसकी जिंदगी संघर्ष, दर्द और आत्मसम्मान की ऐसी मिसाल थी, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। 27 जुलाई को उनकी पुण्यतिथि पर उनकी जिंदगी के कुछ ऐसे किस्से, जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं हैं। यह वो दौर था, जब अमजद खान लगातार काम की तलाश में थे। बेटे के जन्म के बाद उनकी पत्नी अस्पताल में थीं, लेकिन उन्हें घर लाने के लिए अमजद के पास ₹300-400 तक नहीं थे। किस्मत ने उसी दिन करवट ली। उसी दिन उन्हें ‘शोले’ में गब्बर सिंह का किरदार ऑफर हुआ। किसी ने नहीं सोचा था कि यही रोल उन्हें भारतीय सिनेमा का सबसे यादगार विलेन बना देगा।
कम ही लोग जानते हैं कि गब्बर सिंह के लिए पहली पसंद अमजद खान नहीं थे। पहले यह रोल डैनी डेन्जोंगपा को ऑफर हुआ, लेकिन दूसरी फिल्म की शूटिंग की वजह से उन्होंने मना कर दिया। इसके बाद अभिनेता रंजीत के पास भी यह रोल गया, लेकिन उन्होंने भी इंकार कर दिया। आखिरकार लेखक सलीम खान और अभिनेता सत्येन कप्पू की सिफारिश पर रमेश सिप्पी ने अमजद खान का ऑडिशन लिया और बाकी इतिहास बन गया। आज ‘कितने आदमी थे?’ और ‘तेरा क्या होगा कालिया?’ जैसे डायलॉग अमर हो चुके हैं, लेकिन शुरुआत में लेखक सलीम-जावेद चाहते थे कि अमजद खान की आवाज डब कराई जाए। हालांकि, निर्देशक रमेश सिप्पी इस फैसले के खिलाफ थे। बाद में अमिताभ बच्चन ने भी सलाह दी कि अमजद की आवाज ही इस किरदार की सबसे बड़ी ताकत है। यही फैसला आगे चलकर फिल्म की सबसे बड़ी पहचान बन गया।
1976 में गोवा जाते समय अमजद खान की कार का भीषण एक्सीडेंट हो गया। इस हादसे में उनके शरीर की कई हड्डियां टूट गईं, फेफड़े को नुकसान पहुंचा और गर्दन में गंभीर चोट आई। करीब एक साल तक वे बिस्तर पर रहे। इलाज के दौरान दवाइयों और लंबे आराम की वजह से उनका वजन तेजी से बढ़ गया। इसके बाद उनकी सेहत कभी पहले जैसी नहीं हो सकी। अस्पताल में भर्ती अमजद खान से मिलने मशहूर फिल्मकार सत्यजीत रे पहुंचे थे। उन्होंने मजाकिया लेकिन भावुक अंदाज में कहा था, “मैं ‘शतरंज के खिलाड़ी’ बना रहा हूं… उसमें वाजिद अली शाह सिर्फ तुम ही बन सकते हो। इसलिए मेरी फिल्म के लिए… मरना मत।” अमजद खान ठीक हुए और बाद में उन्होंने फिल्म में यह यादगार किरदार निभाया।
27 जुलाई 1992 को हार्ट अटैक से अमजद खान का निधन हो गया। उनके बेटे शादाब खान के मुताबिक, उस समय कई फिल्म निर्माताओं पर अमजद खान की करीब ₹1.27 करोड़ की फीस बकाया थी। उस दौर में यह बहुत बड़ी रकम थी, लेकिन परिवार को कभी वापस नहीं मिली। शादाब खान ने एक इंटरव्यू में बताया था कि पिता के निधन के कुछ समय बाद उनकी मां को अंडरवर्ल्ड से फोन आया। प्रस्ताव दिया गया कि तीन दिन के भीतर पूरी बकाया रकम वसूलकर घर पहुंचा दी जाएगी। लेकिन अमजद खान की पत्नी शैला खान ने साफ इनकार कर दिया। उनका जवाब था, “मेरे पति ने कभी अंडरवर्ल्ड की मदद नहीं ली। उनके जाने के बाद भी मैं ऐसा नहीं करूंगी।”
करीब तीन दशक बाद भी अमजद खान सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित किरदारों में से एक हैं। ‘गब्बर सिंह’ के उनके संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं और उनकी जिंदगी इस बात की मिसाल है कि शोहरत मिलने के बाद भी इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका आत्मसम्मान होता है। अमजद खान को ‘शोले’ के लिए बीएफजेए अवॉर्ड में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला। इसके अलावा दादा और याराना के लिए भी उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला। ‘मां कसम’ में उनके हास्य अभिनय की भी खूब सराहना हुई। अभिनय के अलावा उन्हें साहित्य से भी गहरा लगाव था। उन्होंने फिलॉसफी में प्रथम श्रेणी से मास्टर डिग्री हासिल की थी। अंग्रेजी, उर्दू और फारसी जैसी भाषाओं पर उनकी अच्छी पकड़ थी। 1972 में उन्होंने शेहला खान से निकाह किया और उनके तीन बच्चे हुए। 27 जुलाई 1992 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। आज भी अमजद खान का नाम भारतीय सिनेमा के महान कलाकारों में सम्मान के साथ लिया जाता है।



