नई दिल्ली। लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक 2026 पर चर्चा के दौरान राजस्थान के दिग्गज नेता और आरएलपी (RLP) प्रमुख हनुमान बेनीवाल ने सत्ता पक्ष पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। बेनीवाल ने सदन के पटल पर बीजेपी के कुछ नेताओं के ‘काले चिट्ठे’ खोलने का दावा करते हुए गंभीर आरोप लगाए, जिससे सदन में जबरदस्त हंगामा खड़ा हो गया।
‘पहलवान बेटियों को नहीं छोड़ा, फिर कैसा महिला सम्मान?’
महिला आरक्षण बिल का समर्थन करते हुए बेनीवाल ने बीजेपी की मंशा पर सवाल उठाए। उन्होंने सीधे तौर पर कहा, ‘मैं बिल के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन बीजेपी महिलाओं की हितैषी बनने का ढोंग न करे। आपके यहां तो ऐसे-ऐसे लोग बैठे हैं जिन्होंने हमारी पहलवान बेटियों तक को नहीं छोड़ा। अगर आप वाकई गंभीर होते, तो उन नेताओं को आज ही पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाते।’
बेनीवाल यहीं नहीं रुके, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित ‘एपस्टीन फाइल’ का मामला उठाते हुए दावा किया कि इसमें बीजेपी के एक मंत्री का नाम शामिल है। हालांकि, सदन की कार्यवाही के दौरान सभापति ने इन टिप्पणियों को रिकॉर्ड पर लेने से इनकार कर दिया, लेकिन बेनीवाल के इस बयान ने सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
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‘परिसीमन का विरोध: राजस्थान को 10 सीटों का नुकसान?’
हनुमान बेनीवाल ने ‘परिसीमन विधेयक 2026’ के तकनीकी पहलुओं पर सरकार को घेरते हुए राजस्थान के हितों की बात की। उन्होंने आंकड़ों के साथ बताया:
जनसंख्या का गणित: 2011 की जनगणना के अनुसार राजस्थान की आबादी 6.85 करोड़ थी।
सीटों का नुकसान: यदि 14.20 लाख की जनसंख्या पर एक सीट का फॉर्मूला लागू होता है, तो राजस्थान को 48 सीटें मिलनी चाहिए।
आशंका: बेनीवाल ने दावा किया कि सरकार के नए फॉर्मूले से राजस्थान में केवल 38 सीटें ही बनेंगी, जिससे राज्य को 10 लोकसभा सीटों का भारी नुकसान होगा।
‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी’
संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम के सिद्धांतों का जिक्र करते हुए बेनीवाल ने जातिगत जनगणना की मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि बिना ओबीसी (OBC), एससी (SC) और एसटी (ST) वर्ग के अधिकारों को सुरक्षित किए यह बिल केवल ‘छल-कपट’ है। उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या दक्षिण भारत और उत्तर भारत के संतुलित राज्यों के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जाएगी?
सरकार से पूछे 7 कड़े सवाल
- बिल लाने से पहले जनता से राय (Public Consultation) क्यों नहीं ली गई?
- सांसदों को अध्ययन का समय दिए बिना इतनी जल्दबाजी क्यों की गई?
- क्या यह बिल संविधान के मूल अधिकारों और संघीय ढांचे को कमजोर नहीं करता?
- दक्षिण भारत के राज्यों के प्रतिनिधित्व का संतुलन कैसे बना रहेगा?
- परिसीमन आयोग के निर्णयों पर संसद की क्या भूमिका होगी?
- क्या इसमें ‘ज्यूडिशियल रिव्यू’ (न्यायिक समीक्षा) की गुंजाइश होगी?
- बिना जातिगत जनगणना के सामाजिक न्याय कैसे सुनिश्चित होगा?
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‘लोकसंख्या नहीं, विश्वास का नाम है लोकतंत्र’
बेनीवाल ने अंत में चेतावनी भरे लहजे में कहा कि लोकतंत्र केवल बहुमत का ‘नंबर गेम’ नहीं है, बल्कि यह आपसी सहमति और विश्वास का नाम है। उन्होंने आरोप लगाया कि एनडीए सरकार पिछले कुछ वर्षों में जनता के इसी विश्वास को तोड़ने का काम कर रही है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु चुनावों के बीच इस बिल को लाना बीजेपी का एक ‘चुनावी स्टंट’ मात्र है।



