नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने विदेश सचिव विक्रम मिस्री के कार्यकाल में एक वर्ष का विस्तार करने का निर्णय लिया है। इस फैसले के तहत वह अब अगले वर्ष जुलाई तक अपने पद पर बने रहेंगे। सरकार का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों और भारत की बढ़ती कूटनीतिक गतिविधियों के बीच विदेश मंत्रालय के शीर्ष नेतृत्व में निरंतरता बनाए रखना आवश्यक है।
विक्रम मिस्री भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं और उन्हें चीन मामलों के विशेषज्ञ के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने जुलाई 2024 में विदेश सचिव का पदभार संभाला था। इससे पहले वह उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। अपने लंबे राजनयिक करियर के दौरान उन्होंने चीन, स्पेन और म्यांमार में भारत के राजदूत के रूप में जिम्मेदारियां निभाईं। इसके अलावा वह तीन अलग-अलग प्रधानमंत्रियों के निजी सचिव के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। सरकार का यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब भारत कई महत्वपूर्ण वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर सक्रिय कूटनीतिक भूमिका निभा रहा है।
पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने, क्वाड जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहभागिता और प्रमुख वैश्विक शक्तियों के साथ रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने में विदेश मंत्रालय की भूमिका लगातार बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि विदेश सचिव के कार्यकाल में विस्तार से विदेश नीति के महत्वपूर्ण मुद्दों पर निरंतरता बनी रहेगी। लंबे अनुभव और विभिन्न देशों में कार्य करने की पृष्ठभूमि के कारण विक्रम मिस्री को जटिल कूटनीतिक मामलों का गहरा अनुभव प्राप्त है।
यही अनुभव आने वाले समय में भारत की विदेश नीति के क्रियान्वयन में उपयोगी साबित हो सकता है। वर्तमान समय में वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। ऐसे में व्यापार, सुरक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और क्षेत्रीय सहयोग जैसे विषयों पर भारत की सक्रिय भागीदारी लगातार बढ़ रही है। इन चुनौतियों के बीच अनुभवी नेतृत्व को बनाए रखने का निर्णय सरकार की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
राजनयिक हलकों में इस फैसले को सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इससे विदेश मंत्रालय की कार्यप्रणाली में स्थिरता बनी रहेगी और विभिन्न देशों के साथ चल रही वार्ताओं तथा रणनीतिक पहलों को आगे बढ़ाने में निरंतरता सुनिश्चित होगी। आने वाले महीनों में भारत की कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बैठकों के मद्देनजर यह फैसला विशेष महत्व रखता है।



