Thursday, July 2, 2026
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उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड समाप्त, सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए बनेगा एक समान प्राधिकरण

देहरादून। उत्तराखंड सरकार ने राज्य की अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए मदरसा बोर्ड को समाप्त कर दिया है। इसके साथ ही सभी अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के शिक्षण संस्थानों के संचालन, मान्यता और निगरानी के लिए एक समान वैधानिक प्राधिकरण का गठन किया गया है। इस फैसले के बाद उत्तराखंड ऐसा कदम उठाने वाला देश का पहला राज्य बन गया है।

नई व्यवस्था के तहत अब मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी समुदायों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थान एक ही प्राधिकरण के दायरे में आएंगे। सरकार का कहना है कि इस बदलाव का उद्देश्य सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए समान मानक लागू करना, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना और छात्रों को आधुनिक एवं प्रतिस्पर्धी शिक्षा उपलब्ध कराना है। सरकार के अनुसार पहले मदरसों का संचालन अलग कानून और नियमों के तहत होता था, लेकिन अब नई व्यवस्था लागू होने के बाद सभी संस्थानों की मान्यता, शैक्षणिक मानकों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का संचालन एकीकृत प्रणाली के माध्यम से किया जाएगा।

इसके लिए राज्य स्तर पर विशेषज्ञों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े सदस्यों वाला एक प्राधिकरण गठित किया गया है, जो पाठ्यक्रम, शैक्षणिक गुणवत्ता और संस्थागत विकास से जुड़े मामलों पर निर्णय लेगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि यह कदम राज्य के प्रत्येक छात्र को समान अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। उनके अनुसार आधुनिक शिक्षा, तकनीकी ज्ञान और कौशल विकास के माध्यम से अल्पसंख्यक समुदायों के विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों के लिए बेहतर तरीके से तैयार किया जाएगा। इस अवसर पर कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मान्यता प्रमाणपत्र भी प्रदान किए गए।

सरकार का मानना है कि नई व्यवस्था से शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ेगी और संस्थानों के संचालन में जवाबदेही सुनिश्चित होगी। साथ ही विद्यार्थियों को मुख्यधारा की शिक्षा, आधुनिक विषयों और बेहतर शैक्षणिक संसाधनों तक अधिक प्रभावी पहुंच मिल सकेगी। राज्य प्रशासन का कहना है कि यह बदलाव केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को अधिक समावेशी और भविष्य उन्मुख बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है। हालांकि इस निर्णय पर विभिन्न वर्गों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। जहां सरकार इसे शिक्षा सुधार की दिशा में ऐतिहासिक पहल बता रही है, वहीं कुछ संगठनों ने इस पर अपनी चिंताएं भी व्यक्त की हैं। ऐसे में आने वाले समय में नई व्यवस्था के प्रभाव और उसके परिणामों पर सभी की नजर बनी रहेगी।

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