नई दिल्ली। भारत में वैकल्पिक ईंधन से चलने वाली गाड़ियों को बढ़ावा देने की दिशा में केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने केंद्रीय मोटर यान नियम, 1989 में संशोधन करते हुए फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए E100 एथेनॉल ईंधन को भी शामिल किया है। इससे भविष्य में 100 प्रतिशत एथेनॉल पर चलने वाली गाड़ियों के विकास और लॉन्च का रास्ता साफ हो सकता है। 23 अक्टूबर 2026 को जारी राजपत्र अधिसूचना के मुताबिक, नियमों में पहले शामिल E85 ईंधन के साथ अब E100 को भी मान्यता दी गई है। हालांकि, यह सुविधा सिर्फ उन वाहनों के लिए होगी जिन्हें निर्माता विशेष रूप से इस ईंधन के इस्तेमाल के लिए डिजाइन और प्रमाणित करेंगे।
क्या है E100 फ्यूल?
E100 ऐसा ईंधन है जिसमें मुख्य रूप से एथेनॉल होता है। एथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल आधारित जैव ईंधन है, जिसे गन्ने, मक्का और अन्य जैविक स्रोतों से तैयार किया जा सकता है। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की व्यवस्था के विपरीत, E100 को उच्च एथेनॉल मात्रा वाले ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने के लिए विशेष इंजन तकनीक की जरूरत होती है। सरकार के नए नियमों का उद्देश्य ऐसे वाहनों के लिए नियामकीय व्यवस्था स्पष्ट करना है, जो पेट्रोल के बजाय अधिक मात्रा में एथेनॉल वाले ईंधन पर चल सकें।
नियमों में क्या-क्या बदलाव हुए?
केंद्र सरकार ने केंद्रीय मोटर यान नियम, 1989 के नियम 115 में संशोधन किया है। प्रमुख बदलावों में शामिल हैं:
- E100 को मान्यता: उत्सर्जन संबंधी प्रावधानों में E85 के साथ E100 को भी शामिल किया गया है।
- फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा: कंपनियां निर्धारित तकनीकी और प्रमाणन मानकों के अनुरूप ऐसे वाहन तैयार कर सकेंगी।
- वाहन भार सीमा में बदलाव: संबंधित प्रावधान में सकल वाहन भार की सीमा 3,000 किलोग्राम से बढ़ाकर 3,500 किलोग्राम की गई है।
- बायोडीजल संबंधी बदलाव: संबंधित प्रावधान में B10 की जगह B100 का उल्लेख किया गया है।
- HCNG के प्रावधान: हाइड्रोजन-सीएनजी से जुड़े कुछ तकनीकी बदलाव भी अधिसूचना का हिस्सा हैं।
ये बदलाव संबंधित नियमों और तकनीकी मानकों के दायरे में लागू होंगे।
क्या आपकी मौजूदा पेट्रोल कार में चलेगा E100?
इसका जवाब है—नहीं, जब तक आपकी कार को विशेष रूप से इस ईंधन के लिए डिजाइन और प्रमाणित नहीं किया गया हो। सामान्य पेट्रोल या E20 पर चलने वाली गाड़ियों में सीधे E85 या E100 डालना सुरक्षित नहीं है। इससे इंजन और फ्यूल सिस्टम को नुकसान पहुंच सकता है। मौजूदा कार मालिकों को अपनी गाड़ी में कोई बदलाव कराने या E100 पर स्विच करने की जरूरत नहीं है। यह नई तकनीक से लैस और इसके लिए प्रमाणित वाहनों के लिए एक वैकल्पिक ईंधन व्यवस्था है।
फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक कैसे काम करती है?
फ्लेक्स-फ्यूल वाहन खास तौर पर पेट्रोल और एथेनॉल के अलग-अलग अनुपात वाले मिश्रणों पर चलने के लिए डिजाइन किए जाते हैं। इनमें इंजन और फ्यूल सिस्टम को इस तरह तैयार किया जाता है कि वे निर्धारित ईंधन मिश्रण के अनुसार काम कर सकें। अमेरिका और ब्राजील जैसे देशों में इस तकनीक का इस्तेमाल पहले से किया जा रहा है। भारत में E100 को नियमों में शामिल करने से वाहन निर्माताओं को इस दिशा में नए मॉडल विकसित करने का अवसर मिल सकता है।
पर्यावरण और अर्थव्यवस्था को क्या फायदा हो सकता है?
एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ने से भारत को कई संभावित लाभ मिल सकते हैं।
कच्चे तेल के आयात में कमी: घरेलू स्तर पर तैयार एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ने से पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है।
कृषि क्षेत्र को प्रोत्साहन: गन्ने और अनाज जैसे कृषि उत्पादों से एथेनॉल तैयार किया जाता है। इससे संबंधित उद्योगों और किसानों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
उत्सर्जन में संभावित कमी: एथेनॉल आधारित ईंधन से कुछ प्रकार के प्रदूषक उत्सर्जन घट सकते हैं। हालांकि, वास्तविक पर्यावरणीय लाभ इंजन तकनीक, ईंधन उत्पादन और उसकी पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भर करेंगे।
कब से लागू हुए नए नियम?
मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, संशोधित नियम राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से प्रभावी होते हैं। अप्रैल 2026 में जारी मसौदा अधिसूचना पर सुझाव और आपत्तियां लेने के बाद अंतिम बदलाव जारी किए गए हैं। हालांकि, नियमों में E100 को शामिल करने का मतलब यह नहीं है कि देशभर में E100 फ्यूल उपलब्ध हो गया है या सभी वाहन निर्माता तुरंत ऐसी कारें लॉन्च कर देंगे। इसके लिए वाहन प्रमाणन, मॉडल लॉन्च और ईंधन की उपलब्धता जैसी व्यवस्थाएं भी जरूरी होंगी।



