बीजेपी का कोई भी बड़ा फैसला केवल वर्तमान नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीतिक रणनीति को ध्यान में रखकर लिया जाता है। और राजस्थान की यह राज्यसभा बाजी भी शायद उसी दूरगामी सोच का हिस्सा है।
जयपुर। राजस्थान की राजनीति में राज्यसभा चुनाव सिर्फ सांसद चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह भविष्य की राजनीतिक बिसात बिछाने का भी माध्यम होता है। बीजेपी ने राजस्थान से राज्यसभा के लिए जिन नामों का चयन किया है, उसके पीछे सिर्फ संगठनात्मक संतुलन नहीं, बल्कि गहरा सामाजिक और जातीय संदेश भी छिपा दिखाई देता है। सबसे ज्यादा चर्चा सतीश पूनिया के नाम की हो रही है। सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी ने सतीश पूनिया को राज्यसभा भेजकर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के प्रमुख हनुमान बेनीवाल को राजनीतिक तौर पर चुनौती देने की रणनीति बनाई है?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बीजेपी सामाजिक समीकरणों के आधार पर राजनीति के सफल प्रयोग करती रही है। ऐसे में सतीश पूनिया का चयन भी एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पूनिया बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और राजस्थान की सामाजिक व जातीय राजनीति को करीब से समझते हैं। खुद को किसान पुत्र के रूप में प्रस्तुत करने वाले पूनिया की पहचान जाट समाज में एक प्रभावशाली चेहरे के तौर पर रही है।
राजस्थान में जाट समाज लंबे समय तक कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता रहा है। इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि सामंतवादी व्यवस्था के खिलाफ चले आंदोलनों से जुड़ी रही है। राज्य की राजनीति में चाहे नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, परसराम मदेरणा हों या शीशराम ओला, हेमाराम चौधरी या फिर हरीश चौधरी जैसे बड़े जाट नेता। हमेशा कांग्रेस की राजनीति के केंद्र में रहे हैं। आज भी कांग्रेस ने गोविंद सिंह डोटासरा को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर इस सामाजिक आधार को मजबूत रखने की कोशिश की है।
दूसरी ओर बीजेपी ने गुर्जर समाज को भी साधने का प्रयास किया है। गुर्जर समाज ऐतिहासिक रूप से जनसंघ और बीजेपी के करीब रहा, लेकिन राजेश पायलट और बाद में सचिन पायलट के प्रभाव ने इस वर्ग का बड़ा हिस्सा कांग्रेस की ओर आकर्षित किया। आज भी सचिन पायलट पूर्वी राजस्थान में बीजेपी के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती माने जाते हैं।
यही वजह है कि बीजेपी ने अलका सिंह गुर्जर को भी राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है। अलका सिंह गुर्जर खुद विधायक रह चुकी हैं और उनके पति नाथू सिंह गुर्जर दौसा से लोकसभा सांसद रह चुके हैं। गुर्जर समाज में उनकी मजबूत पहचान है और बीजेपी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख गुर्जर चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहती है।
अब फिर लौटते हैं सतीश पूनिया पर। दरअसल राजस्थान में जाट समाज संख्या और राजनीतिक प्रभाव दोनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। करीब 70 विधानसभा सीटों पर इस समाज का सीधा या निर्णायक प्रभाव माना जाता है। चूरू, सीकर, झुंझुनूं और नागौर जैसे क्षेत्रों के साथ-साथ शेखावाटी और जयपुर देहात की राजनीति में जाट वोट निर्णायक भूमिका निभाता है।
ऐसे में सतीश पूनिया को राज्यसभा भेजने का संदेश सिर्फ सम्मान देने तक सीमित नहीं दिखता। राजनीतिक विश्लेषक इसे जाट राजनीति में बीजेपी के मजबूत दावे और हनुमान बेनीवाल के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश के रूप में भी देख रहे हैं। पूनिया आमेर से विधायक रह चुके हैं और जयपुर देहात के सामाजिक समीकरणों पर उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है।
यानी साफ है कि बीजेपी ने राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन के जरिए दो बड़े सामाजिक वर्गों, जाट और गुर्जर, दोनों को स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है। सवाल यह है कि क्या यह रणनीति आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में बीजेपी को फायदा पहुंचाएगी? और क्या सतीश पूनिया वास्तव में जाट राजनीति में बीजेपी के नए बड़े चेहरे के रूप में उभरेंगे?
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि बीजेपी का कोई भी बड़ा फैसला केवल वर्तमान नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीतिक रणनीति को ध्यान में रखकर लिया जाता है। और राजस्थान की यह राज्यसभा बाजी भी शायद उसी दूरगामी सोच का हिस्सा है।



