मणिपुर में हिंसा थम नहीं रही, यहां म्यांमार में कुकी उग्रवादियों के हमले में महिला समेत दस जनों की हत्या कर दी गई और घराें में आग लगाई गई सो अलग। वहीं दिल्ली में सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर देशभर से लोग जमा हो रहे हैं, ये जंतर मंतर पर धरना देना चाह रहे हैं पर सरकार इसकी इजाजत नहीं दे रही। उन्हें रोका जा रहा है, गिरफ्तार किया जा रहा है। मणिपुर में जहां हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही वहीं दिल्ली में महज हालात बिगड़ने की आशंका में हजारों जवान तैनात कर दिए गए हैं। मेट्रो-ट्रेनें ही नहीं रद्द की गईं, नेट तक बंद कर दिया गया। हालात यहां भी अच्छे नहीं हैं पर क्या विरोध के नाम पर इतना इंतजाम जरूरी है तो मणिपुर भी तो देश का हिस्सा है। राष्ट्रपति शासन हटने के बाद सरकार भी बन गई फिर इतनी ढिलाई क्यों?
मणिपुर में जातीय हिंसा 3 मई 2023 को शुरू हुई थी। इसे करीब तीन साल, पांच महीने हो चुके हैं। इस दौरान दो हजार से अधिक लोगों की जानें गईं और हजारों परिवार विस्थापित हुए। अप्रैल 2026 में राज्य सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, मार्च 2026 तक लगभग 58,881 लोग अपने घरों से विस्थापित थे। पिछले माह ही सुप्रीम कोर्ट ने हिंसा से जुड़े मामलों की जांच और सुनवाई में देरी पर चिंता जताई। हजारों मामलों में बड़ी संख्या की जांच या अन्य कार्रवाई लंबित है और मुकदमों की सुनवाई सीमित मामलों में ही शुरू हो पाई है। अदालत ने विशेष अदालतों और जांच में तेजी लाने की जरूरत पर भी जोर दिया। यह स्थिति बताती है कि केवल सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है; न्याय में देरी भी लोगों के भरोसे को कमजोर करती है। मणिपुर की समस्या को केवल कानून-व्यवस्था का मामला मानकर नहीं देखा जा सकता। जब समुदाय एक-दूसरे पर भरोसा खो देते हैं, अपने इलाकों में सिमट जाते हैं और दूसरे समुदाय की मौजूदगी को खतरे के रूप में देखने लगते हैं, तब शांति की प्रक्रिया और कठिन हो जाती है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सभी पक्षों की शिकायतें सुने, भेदभाव के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराए और बातचीत के लिए विश्वसनीय मंच तैयार करे।
इसके साथ ही राहत शिविरों में रह रहे परिवारों के पुनर्वास, बच्चों की शिक्षा, महिलाओं की सुरक्षा और आजीविका की बहाली को प्राथमिकता देनी होगी। लोगों को केवल सहायता राशि देना पर्याप्त नहीं है; उन्हें सुरक्षित घर, सम्मानजनक जीवन और भविष्य के प्रति भरोसा भी चाहिए। मणिपुर का संकट केंद्र और राज्य सरकार, प्रशासन तथा सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी परीक्षा है। सवाल पूछना किसी एक राजनीतिक दल का एजेंडा नहीं, बल्कि उन नागरिकों के प्रति जवाबदेही की मांग है जिन्होंने हिंसा में अपने परिजन, घर और आजीविका खोई है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि शांति बहाली की समयबद्ध योजना क्या है, लंबित मामलों की जांच कब पूरी होगी, दोषियों को सजा दिलाने में कितनी प्रगति हुई है और विस्थापित परिवारों की सुरक्षित घर वापसी के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। इन सवालों के जवाब केवल बयानों से नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से मिलने चाहिए।
लोकतंत्र में विरोध और असहमति के लिए जगह होना जरूरी है। लेकिन हिंसा से प्रभावित लोगों की पीड़ा को भी उतनी ही गंभीरता से सुनना होगा। दिल्ली में शांतिपूर्ण प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए प्रशासनिक तत्परता दिखाई जा सकती है, तो मणिपुर में स्थायी शांति, न्याय और पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए भी उतनी ही निरंतरता और प्रतिबद्धता दिखनी चाहिए। तीन साल से ज्यादा समय किसी भी सरकार के लिए आत्ममंथन करने को पर्याप्त है। मणिपुर को अब आश्वासन नहीं, ठोस परिणाम चाहिए। हिंसा का अंत केवल बंदूकें शांत होने से नहीं होगा; इसके लिए न्याय, संवाद, जवाबदेही और समुदायों के बीच भरोसे की वापसी अनिवार्य है। आखिर मणिपुर के लोगों को भी यह महसूस होना चाहिए कि वे देश के बाकी नागरिकों की तरह सुरक्षित, सम्मानित और सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। जब मणिपुर में हिंसा और अशांति का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा, तब दिल्ली में महज विरोध प्रदर्शन की आशंका पर सुरक्षा के इतने कड़े इंतजाम क्यों किए जाते हैं? क्या सरकार की प्राथमिकताएं अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग हो जाती हैं?
मणिपुर लंबे समय से हिंसा, विस्थापन और अविश्वास की चुनौती से जूझता रहा है। वहां सामान्य जनजीवन बहाल करना, लोगों में सुरक्षा का भरोसा पैदा करना और शांति कायम करना सरकार की बड़ी जिम्मेदारी है। दूसरी ओर, दिल्ली में जब नागरिक या राजनीतिक संगठन विरोध के लिए जुटते हैं, तो सुरक्षा व्यवस्था, बैरिकेडिंग, हिरासत और आवाजाही पर पाबंदियों जैसे कदम चर्चा में आ जाते हैं। सुरक्षा व्यवस्था करना प्रशासन का दायित्व है, लेकिन यह भी जरूरी है कि उसके नाम पर शांतिपूर्ण विरोध की गुंजाइश ही खत्म न कर दी जाए।आखिर सवाल यह है कि हिंसा रोकने के लिए जिस दृढ़ता की जरूरत है, क्या वही तत्परता असहमति को सुनने में भी दिखाई देती है? किसी भी सरकार के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती हो सकती है, लेकिन हर विरोध को संभावित खतरे की तरह देखना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है। हिंसा और शांतिपूर्ण प्रदर्शन को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता। हिंसा पर कानून के मुताबिक सख्ती जरूरी है, जबकि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के मामले में संयम, संवाद और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है।



