जयपुर: राजनीति में कई बार शांत और लो-प्रोफाइल रहने वाले चेहरे अचानक सबसे बड़े सियासी मोहरे बनकर उभरते हैं। ऐसा ही कुछ देखने को मिला जब उदयपुर से भाजपा के लोकसभा सांसद मन्नालाल रावत को भारतीय जनता पार्टी के अनुसूचित जनजाति (ST) मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया। महज दो साल पहले तक प्रशासनिक सेवा में तैनात रहे मन्नालाल रावत का राष्ट्रीय स्तर के इतने बड़े सांगठनिक पद तक पहुंचना चौंकाने वाला जरूर है, लेकिन इसके पीछे भाजपा का एक बेहद सोचा-समझा राजनीतिक गणित और बड़ा संदेश छिपा है।
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परिवहन विभाग के अतिरिक्त आयुक्त से सांसद तक का सफर
मन्नालाल रावत राजस्थान के परिवहन विभाग में अतिरिक्त आयुक्त के पद पर कार्यरत थे। साल 2024 के आम चुनावों से ठीक पहले उन्होंने सरकारी सेवा से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थामा। पार्टी ने उन पर भरोसा जताते हुए उदयपुर आरक्षित लोकसभा सीट से मैदान में उतारा, जहां उन्होंने 2.61 लाख से अधिक मतों के भारी अंतर से दर्ज की। जीत के बाद अब उन्हें राष्ट्रीय एसटी मोर्चा की कमान सौंपना यह साफ दर्शाता है कि भाजपा उन्हें दक्षिण राजस्थान में पार्टी के एक बड़े आदिवासी चेहरे के रूप में स्थापित कर रही है।
BAP और ‘भील प्रदेश’ के एजेंडे को काउंटर करने की रणनीति
भाजपा के इस फैसले का सबसे बड़ा कारण दक्षिण राजस्थान (मेवाड़-वागड़ क्षेत्र) में भारत आदिवासी पार्टी (BAP) का तेजी से बढ़ता प्रभाव है:
- BAP का उभार: 2023 के विधानसभा चुनाव में BAP ने चौरासी, आसपुर और धरियावद सीटों पर रिकॉर्ड वोट शेयर के साथ जीत दर्ज की।
- बांसवाड़ा लोकसभा में बड़ी सेंध: 2024 के लोकसभा चुनाव में BAP नेता राजकुमार रोत ने बांसवाड़ा सीट पर भाजपा और कांग्रेस दोनों को पछाड़ते हुए 2.47 लाख से अधिक मतों से जीत हासिल की।
- बदलता वोट शेयर: 2019 के मुकाबले 2024 के लोकसभा चुनावों में आदिवासी सीटों पर भाजपा का वोट शेयर करीब 6% घटा, जबकि BAP का क्षेत्रीय वोट शेयर 50% के आंकड़े को पार कर गया।
ऐसे में BAP के अलग ‘भील प्रदेश’ और विशिष्ट आदिवासी पहचान के एजेंडे को काउंटर करने के लिए भाजपा ने मन्नालाल रावत को आगे किया है, जिनकी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े संगठन ‘वनवासी कल्याण परिषद’ से पुरानी नजदीकी रही है।
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आरएसएस कनेक्शन और वैचारिक जंग
मन्नालाल रावत की नियुक्ति के बाद अब दक्षिण राजस्थान में एक बड़ा वैचारिक और राजनीतिक मुकाबला देखने को मिलेगा:
- मन्नालाल रावत (BJP) का पक्ष: एसटी मोर्चा अध्यक्ष बनने के बाद रावत ने कहा कि पार्टी विकास, कौशल सुधार, कृषि और पलायन रोकने के मुद्दों पर काम करेगी। उन्होंने BAP के ‘भील प्रदेश’ के एजेंडे को अलगाववादी सोच करार देते हुए कहा कि भाजपा संविधान के दायरे में रहकर आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने का काम करेगी।
- राजकुमार रोत (BAP) का रुख: दूसरी तरफ BAP सांसद राजकुमार रोत का आरोप है कि भाजपा आदिवासियों को उनकी मूल पहचान से दूर कर हिंदू समाज में मिलाने का प्रयास करती है। रोत का कहना है कि राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल हिस्सों को मिलाकर ‘भील प्रदेश’ बनाने की मांग जारी रहेगी।
दक्षिण राजस्थान की 28 आदिवासी बहुल विधानसभा सीटों पर इस सियासी जंग के केंद्र में अब सांसद मन्नालाल रावत होंगे, जिन पर भाजपा के पारंपरिक आदिवासी वोट बैंक को दोबारा सहेजने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी।



