मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। ओमान की खाड़ी में अमेरिकी सेना ने ईरानी बंदरगाह से निकले एक वाणिज्यिक कार्गो जहाज को निशाना बनाकर उसकी आवाजाही रोक दी। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, जहाज का चालक दल बार-बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद आगे बढ़ रहा था। इसके बाद अमेरिकी लड़ाकू विमान ने जहाज के पिछले हिस्से पर सटीक हमला किया, जिससे उसका प्रोपल्शन सिस्टम बंद हो गया।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास जहाजों की आवाजाही और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर पहले से ही चिंता बनी हुई है। इस समुद्री मार्ग में तनाव बढ़ने का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार, माल ढुलाई और बीमा लागत पर पड़ सकता है। हालांकि, इससे भारत में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतें तुरंत बढ़ेंगी, ऐसा निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता।
अमेरिकी लड़ाकू विमान ने कैसे रोका कार्गो जहाज?
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, यह कार्रवाई शनिवार, 10 अक्टूबर को ओमान की खाड़ी में की गई। अमेरिकी सेना ने पनामा के झंडे वाले वाणिज्यिक जहाज M/V Ocean Molica, जिसे Arika Sun के नाम से भी जाना जाता है, को निशाना बनाया।
CENTCOM का दावा है कि जहाज ईरानी बंदरगाह से निकलने के बाद अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी से बचकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा था। चालक दल को कई बार चेतावनी दी गई, लेकिन जहाज के आगे बढ़ने पर अमेरिकी लड़ाकू विमान ने उसके पिछले हिस्से पर सटीक हमला किया। अमेरिकी पक्ष के मुताबिक, इससे जहाज की आगे बढ़ने की क्षमता पूरी तरह बंद हो गई और चालक दल को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। यह जानकारी अमेरिकी सैन्य कमान की ओर से जारी बयान पर आधारित है। जहाज के संचालक का पक्ष तत्काल उपलब्ध नहीं था।
ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी में अब तक क्या हुआ?
CENTCOM के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने 14 जुलाई से ईरानी बंदरगाहों पर आने-जाने वाले जहाजों के खिलाफ नाकाबंदी फिर से लागू की थी। अमेरिकी सैन्य कमान ने दावा किया है कि इसके बाद तीन महीने की कार्रवाई के दौरान चार वाणिज्यिक जहाजों को निष्क्रिय किया गया और 135 जहाजों को वापस लौटने के लिए कहा गया।
अमेरिकी पक्ष ने यह भी कहा है कि इस अवधि में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कथित छाया नेटवर्क से जुड़े 10 टैंकरों को नष्ट किया गया। ये आंकड़े अमेरिकी सेना के दावे हैं और इन्हें उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इस कार्रवाई पर अमेरिका के भीतर भी सवाल उठे हैं। अमेरिकी सीनेटर क्रिस मर्फी ने वाणिज्यिक जहाज पर सैन्य हमले को लेकर आपत्ति जताई और सवाल किया कि ऐसे अभियानों पर करदाताओं का पैसा क्यों खर्च किया जा रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान की कार्रवाई का दावा
दूसरी तरफ, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने दावा किया है कि उसकी नौसेना ने होर्मुज जलडमरूमध्य में NV Sunshine नाम के एक बड़े LPG जहाज को निशाना बनाया। ईरानी मीडिया के मुताबिक, यह जहाज जलडमरूमध्य के दक्षिण में ऐसे मार्ग से गुजरने की कोशिश कर रहा था, जिसे ईरान ने प्रतिबंधित बताया है। ईरानी पक्ष का कहना है कि जहाज को कार्रवाई में नुकसान पहुंचा और उसके इंजन कक्ष तथा प्रोपल्शन सिस्टम में आग लगी। वहीं, ब्रिटेन की समुद्री निगरानी एजेंसी UKMTO ने भी जलडमरूमध्य में एक टैंकर से जुड़ी घटना की जानकारी दी। एजेंसी के अनुसार, जहाज के बाईं ओर किसी अज्ञात प्रोजेक्टाइल से टक्कर हुई, जिसके बाद उसमें आग लग गई। शुरुआती रिपोर्ट में चालक दल के सुरक्षित होने की बात कही गई, जबकि नुकसान और पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन जारी था।
इन घटनाओं की परिस्थितियों और जिम्मेदारी को लेकर स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। फिलहाल दोनों पक्ष समुद्री क्षेत्र में अपनी कार्रवाई और दूसरे पक्ष की गतिविधियों को लेकर अलग-अलग दावे कर रहे हैं।
तेल और गैस की सप्लाई के लिए होर्मुज इतना अहम क्यों?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा परिवहन मार्गों में शामिल है। युद्ध से पहले वैश्विक स्तर पर खपत होने वाले तेल का करीब पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता था। बड़ी मात्रा में तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी LNG की ढुलाई भी इसी मार्ग से होती है। ऐसे में यहां जहाजों पर हमले, नौसैनिक नाकाबंदी या आवाजाही में रुकावट आने से केवल तेल की आपूर्ति ही प्रभावित नहीं होती। माल ढुलाई का खर्च, जहाजों का बीमा, डिलीवरी का समय और ऊर्जा कंपनियों की परिचालन लागत भी बढ़ सकती है।
रॉयटर्स की हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, सितंबर के दौरान मध्य पूर्व से कच्चे तेल का निर्यात कई दिनों में युद्ध से पहले के स्तर से ऊपर पहुंचा था। इसके बावजूद अक्टूबर के पहले सप्ताह में टैंकरों पर हमलों और समुद्री जोखिमों में बढ़ोतरी ने बाजार की चिंताएं बढ़ा दीं। इसका मतलब है कि बाजार पर असर केवल तेल की कुल उपलब्धता से नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित तरीके से पहुंचाने की क्षमता से भी पड़ता है।
क्या भारत में पेट्रोल-डीजल और LPG महंगी होगी?
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बन सकता है, खासकर अगर होर्मुज से जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक बाधित रहती है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने के साथ परिवहन और बीमा खर्च में इजाफा भी ऊर्जा आपूर्ति की लागत को बढ़ा सकता है। भारत जैसे तेल आयात करने वाले देश के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगा कच्चा तेल चिंता का विषय बन सकता है। हालांकि, घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल के भाव पर निर्भर नहीं करतीं। रुपये और डॉलर की विनिमय दर, कर, तेल कंपनियों की लागत और मूल्य निर्धारण से जुड़े फैसले भी इन पर असर डालते हैं। LPG की कीमतों पर भी आयात लागत और घरेलू मूल्य निर्धारण व्यवस्था का प्रभाव पड़ता है।
इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिकी कार्रवाई के बाद भारत में पेट्रोल, डीजल या गैस की कीमतें निश्चित रूप से बढ़ जाएंगी। लेकिन अगर समुद्री तनाव बढ़ता है और ऊर्जा आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित होती है, तो महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका जरूर रहेगी।
आगे क्या रहेगा अहम?
ओमान की खाड़ी में अमेरिकी कार्रवाई और होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान के दावों ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है। आने वाले दिनों में जहाजों की आवाजाही, समुद्री हमलों की संख्या, अमेरिकी नाकाबंदी की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के भाव पर बाजार की नजर रहेगी।
यदि दोनों पक्षों के बीच टकराव और बढ़ता है, तो इसका असर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति तक पहुंच सकता है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि समुद्री मार्गों पर तनाव कितने समय तक बना रहता है और क्या तेल व गैस की ढुलाई सामान्य स्तर पर लौट पाती है।



