पग-पग पर दलाल घूसखोरों को मालामाल कर रहे हैं। छोटी घूसखोरी में पकड़े जाने वाले कर्मचारी हों या अफसर…कमीशन बचाने का लालच करते होंगे तभी तो ना वो दलाल नहीं रखते। उदयपुर में एसओजी के एएसपी के नाम से दो करोड़ की घूस लेते दलाल तो पकड़ा गया…एएसपी पर न जाने गिरफ्तारी से पहले कितने कानून अड़ंगा लगाएंगे। यह भी हो सकता है कि बाद में साहब को क्लीन चिट भी मिल जाए। घूसखोरों में दलालों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। वे शिकार तलाशते हैं और फिर अपने आका को महफूज रखते हुए पूरी रकम लेकर अपना हिस्सा कमा लेते हैं।
उदयपुर में एसओजी के एएसपी के नाम पर दो करोड़ रुपए की रिश्वत लेने के मामले में गिरफ्तारी ने एक बार फिर उस सवाल को सामने ला दिया है, जो हर रिश्वतखोरी के मामले के बाद उठता है—क्या सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार केवल घूस लेने वाले अधिकारी-कर्मचारी तक सीमित है, या उसके पीछे सक्रिय दलालों का पूरा नेटवर्क भी इसकी बड़ी वजह है? रिश्वत के इस खेल में दलाल महज रकम पहुंचाने वाले माध्यम नहीं रह गए हैं। कई मामलों में वे अधिकारी और शिकायतकर्ता या आरोपी के बीच संपर्क की कड़ी बनते हैं। अधिकारी का नाम लेकर रकम तय करना, सौदेबाजी करना और फिर पैसा पहुंचाना—यह पूरा तंत्र तभी चलता है, जब कहीं न कहीं उसे भरोसा हो कि व्यवस्था में उसके लिए बच निकलने की गुंजाइश मौजूद है।
उदयपुर का मामला इसी गंभीर पहलू की ओर ध्यान खींचता है। यदि किसी अधिकारी के नाम पर इतनी बड़ी रकम मांगी और ली जा रही थी, तो जांच का दायरा केवल गिरफ्तार व्यक्ति तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह पता लगाना जरूरी है कि दलाल किसके संपर्क में था, किसके कहने पर रकम मांगी गई, पैसा कहां जाना था और इस पूरे नेटवर्क में और कौन-कौन शामिल था। सबसे चिंताजनक बात यह है कि दलाल कई बार घूसखोरों के लिए ढाल भी बन जाते हैं। अधिकारी सीधे लेन-देन से दूर रहता है और बीच में दलाल खड़ा कर दिया जाता है। बाद में यही कहा जा सकता है कि रकम तो किसी और ने मांगी थी, अधिकारी से उसका कोई सीधा संबंध नहीं। यदि जांच इसी बिंदु पर कमजोर पड़ गई तो भ्रष्टाचार का असली चेहरा सामने आने के बजाय केवल एक व्यक्ति गिरफ्त में आकर मामला खत्म हो जाएगा।बड़े रिश्वत मामलों में असली चुनौती रकम बरामद करना नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क तक पहुंचना है।
करोड़ों की रिश्वत की बात सामने आती है तो यह मान लेना पर्याप्त नहीं कि एक दलाल या एक अधिकारी ही पूरी कहानी है। जांच एजेंसियों को पैसे के स्रोत, संपर्कों, फोन रिकॉर्ड, लेन-देन और कथित सौदे की पूरी कड़ी की पड़ताल करनी चाहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई तभी प्रभावी मानी जाएगी, जब दलाल भी पकड़े जाएं, संरक्षण देने वाले भी सामने आएं और रिश्वत मांगने वाले तक भी जांच पहुंचे। वरना एक गिरफ्तारी के बाद कुछ दिन सुर्खियां बनेंगी और फिर वही तंत्र किसी नए दलाल, नए सौदे और नई रकम के साथ सक्रिय हो जाएगा। सवाल सिर्फ दो करोड़ रुपए का नहीं है।
सवाल उस व्यवस्था का है, जिसमें सरकारी पद और प्रभाव का नाम लेकर करोड़ों के सौदे की हिम्मत पैदा होती है। दलालों की सक्रियता पर लगाम लगाए बिना घूसखोरी के इस कारोबार पर अंकुश लगाना मुश्किल है। भ्रष्टाचार के मामलों में दलालों की भूमिका को हल्के में लेना खतरनाक है। वे अधिकारी और रिश्वत देने वाले के बीच ऐसी दीवार बन जाते हैं, जिसके पीछे असली सौदागर छिप सकता है। यदि दलाल पकड़ा गया और जांच वहीं रुक गई तो संभव है कि असल लाभार्थी तक कानून की पहुंच ही न हो पाए। यही वजह है कि हर बड़े रिश्वत मामले में पैसे के साथ-साथ पूरे नेटवर्क की जांच जरूरी है।
फोन कॉल, मुलाकातें, बैंक लेन-देन, संपत्ति, पुराने संपर्क और कथित सौदे की पूरी कड़ी सामने आए तो ही यह स्पष्ट हो सकता है कि दलाल अकेले सक्रिय था या किसी अधिकारी अथवा प्रभावशाली व्यक्ति के इशारे पर काम कर रहा था। लेकिन दूसरी तरफ केवल इस आधार पर किसी अधिकारी को दोषी मान लेना भी उचित नहीं कि उसके नाम का इस्तेमाल हुआ। जांच को प्रमाणों के आधार पर ही आगे बढ़ना चाहिए।
नाम का इस्तेमाल और वास्तविक संलिप्तता—दोनों अलग बातें हैं। इसलिए सवाल दलाल की गिरफ्तारी से ज्यादा बड़ा है—क्या जांच उस व्यक्ति तक पहुंचेगी, जिसके लिए कथित तौर पर रिश्वत का सौदा किया गया था? यदि हर बार दलाल ही अंतिम आरोपी बनकर रह जाए और जांच की कड़ी वहीं टूट जाए, तो भ्रष्टाचार के बड़े खिलाड़ियों तक पहुंचना मुश्किल होगा। रिश्वतखोरी पर असली चोट तभी होगी जब माध्यम ही नहीं, पूरी कड़ी सामने आए। दलाल पकड़े जाएं, लेकिन जांच वहीं खत्म न हो। क्योंकि भ्रष्टाचार का नेटवर्क तभी टूटेगा, जब पैसे लेने वाले हाथ के साथ उस व्यवस्था की भी पहचान हो, जिसने उस हाथ को काम करने का भरोसा दिया।



