(प्रज्ञा पांडे)। कल्पना कीजिए…आपके पास एक ऐसी मशीन है जो आपको हर दिन हजारों लोगों की जिंदगी दिखाती है। आप देख सकते हैं, कौन कितना सफल है, कौन कितना खुश है, कौन कहां घूम रहा है, और किसकी जिंदगी कितनी परफेक्ट है। लेकिन उस मशीन की एक समस्या है…वह आपको किसी की पूरी कहानी नहीं दिखाती। वह सिर्फ वही दिखाती है जो लोग आपको दिखाना चाहते हैं और आज वह मशीन हमारे हाथ में हर समय मौजूद रहती है, हमारा फोन। हम पहली पीढ़ी हैं जो दूसरों की जिंदगी के सबसे अच्छे पल रोज देखती है। पहले तुलना सीमित थी। आप अपने आसपास के लोगों से तुलना करते थे। लेकिन आज सब कुछ बदल गया है।
एक 20 साल का इंसान सुबह उठते ही दुनिया के हजारों लोगों की “बेस्ट मोमेंट्स” देख सकता है…किसी का लक्ज़री, किसी का परफेक्ट बॉडी ट्रांसफॉर्मेशन, किसी का ड्रीम करियर, किसी की फेयरी टेल रिलेशनशिप। समस्या यह नहीं है कि लोग खुश हैं। समस्या यह है कि हमारा दिमाग भूल जाता है कि यह पूरी रियलिटी नहीं है। इंसानी दिमाग तुलना करने के लिए बना है। साइकोलॉजी में इसे सामाजिक तुलना कहा जाता है। हम खुद को समझने के लिए दूसरों को रिफरेन्स पॉइंट बनाते हैं। लेकिन सोशल मीडिया ने इस प्रोसेस को बदल दिया।
रियल लाइफ में अब हम अपनी फेलियर, डाउटस, बोरिंग डेज की तुलना किसी और की अचीवमेंट्स, सेलिब्रेशंस, और हैप्पी मोमेंट्स से करते हैं। यहीं से असली समस्या शुरू होती है। लाइक सिर्फ एक नंबर नहीं हमारे दिमाग के लिए डिजिटल अप्रूवल बन गया है। एक नोटिफिकेशन आता है। आपका मूड बदल जाता है। क्यों? क्योंकि इंसानी दिमाग सोशल एक्सेप्टेन्स को रिवॉर्ड की तरह महसूस करता है। लाखों साल पहले समूह से स्वीकार किया जाना सर्वाइवल के लिए जरूरी था। आज वही जरूरत लाइक, कमैंट्स और फॉलोवर्स के रूप में दिखाई देती है। लेकिन खतरा तब शुरू होता है जब…”मुझे अच्छा लग रहा है” बदलकर “लोगों को मेरा अच्छा लगना चाहिए” बन जाता है। जब जिंदगी अनुभव नहीं, प्रदर्शन बन जाती है। क्या हम किसी जगह इसलिए जाते हैं क्योंकि हमें वह जगह पसंद है? या इसलिए क्योंकि वहां की तस्वीर अच्छी आएगी? क्या हम कोई अचीवमेंट्स इसलिए सेलिब्रेट करते हैं? या इसलिए क्योंकि लोग उसे देखकर प्रभावित होंगे? धीरे-धीरे एक बदलाव आता है। हम जिंदगी जीने के साथ-साथ अपनी जिंदगी को लगातार दर्शकों के लिए तैयार करने लगते हैं।
जब प्यार भी कंटेंट बन जाए और आपका रिश्ता सोशल मीडिया के लिए पब्लिसिटी स्टंट।
अब कई लोग प्यार को सिर्फ महसूस नहीं करते… उसे दिखाते भी हैं। कपल फोटोज, एनिवर्सरी पोस्ट्स, व्हाट्सप्प स्टेटस ये सब सामान्य हैं। लकिन समस्या तब आती है जब ऑनलाइन इमेज और रियल रेलशनशिप के बीच अंतर बढ़ने लगता है। क्योंकि कैमरे के सामने परफेक्ट दिखना आसान है…लेकिन असल जिंदगी में समझना, सुनना और साथ निभाना मुश्किल है।
आज की दुनिया में लोगो का खुद की ही फोटो को बिना फिल्टर के स्वीकार करना मुश्किल क्यों हो रहा है? फिल्टर सिर्फ चेहरे नहीं बदलते। कई बार वे हमारी अपनी नजर भी बदल देते हैं। जब दिमाग बार-बार एक एडिटेड वर्शन देखता है, तो असली चेहरा कम आकर्षक लग सकता है। यही कारण है कि आज बॉडी, इमेज और खुद पर social media के प्रभाव को लेकर वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक चर्चा कर रहे हैं।
सोशल मीडिया कंपनियां चाहती हैं कि आप ज्यादा समय तक स्क्रीन पर रहें। क्यों? क्योंकि आपका ध्यान उनकी सबसे बड़ी संपत्ति है। इनफिनिट स्क्रॉलिंग, नोटिफिकेशन और रील्स इस तरह बनाए जाते हैं कि हमारा दिमाग बार-बार वापस मोबाइल की ओर अट्रैक्ट हो जाए। हम सोचते हैं कि हम सिर्फ मनोरंजन कर रहे हैं…लेकिन कई बार हमारा ध्यान लगातार खींचा जा रहा होता है। तो क्या सोशल मीडिया दुश्मन है? नहीं। समस्या प्लेटफॉर्म की नहीं है, हम किस तरह उसे यूज़ कर रहे है। ये है असली चिंता का विषय।
सोशल मीडिया हमें जोड़ सकता है, सीखने का मौका दे सकता है, प्रेरणा दे सकता है…लेकिन जब यह हमारी खुशी, पहचान, सफलता और आत्मविश्वास का मुख्य स्रोत बन जाए…तब रील लाइफ धीरे-धीरे रियल लाइफ पर हावी होने लगती है। आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सोशल मीडिया कितना समय ले रहा है। सवाल यह है की क्या हमारी जिंदगी अब हमारे लिए है.. या दूसरों को दिखाने के लिए? क्योंकि दुनिया को दिखाने के लिए बनाई गई जिंदगी बाहर से खूबसूरत लग सकती है…लेकिन असली सुकून उस जिंदगी में मिलता है जिसे कैमरा बंद होने के बाद भी जीने का मन करे।



