जयपुर की पूर्णिमा यूनिवर्सिटी में एक एमबीए छात्रा ने सुसाइड कर लिया। कारण तलाशे जा रहे हैं…छठी मंजिल से कूद कर छात्रा ने आत्महत्या की, इसको लेकर यूनिवर्सिटी प्रबंधन खुद को बचाने में जुट गया है। कुछ समय पहले नीरजा मोदी स्कूल में चौथी कक्षा की छात्रा ने भी इसी तरह आत्महत्या की थी। राजस्थान में कोटा से लेकर जयपुर और सीकर तक विद्यार्थियों की आत्महत्या के मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं। हर घटना के बाद चिंता जताई जाती है, जांच के आदेश होते हैं और कुछ नए दिशा-निर्देश जारी कर दिए जाते हैं। लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है। आखिर कब तक ऐसा चलता रहेगा?
आंकड़ों के अनुसार, 1 जनवरी 2024 से 31 दिसंबर 2025 के बीच प्रदेश में 55 स्टूडेंट्स की आत्महत्या से मौत दर्ज की गई। इनमें सबसे अधिक 28 मामले कोटा में सामने आए—2024 में 16 और 2025 में 12। जयपुर में इसी दो वर्ष की अवधि में छह मामले और सीकर में पांच मामले दर्ज किए गए। कोटा और सीकर जैसे बड़े कोचिंग एवं शिक्षा केंद्रों में मामलों का अधिक होना अपने आप में गंभीर चेतावनी है। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं है। 55 जिंदगियां, 55 परिवार और 55 अधूरे सपने। सवाल यह है कि हम हर घटना के बाद शोक तो व्यक्त करते हैं, लेकिन उस माहौल को बदलने के लिए क्या करते हैं जो बच्चों और युवाओं को भीतर ही भीतर तोड़ रहा है?
पढ़ाई, करियर और भविष्य के सपने लेकर शिक्षण संस्थानों में पहुंचने वाले युवा आखिर किस मानसिक और सामाजिक दबाव से गुजर रहे हैं कि जिंदगी समाप्त करने जैसा कदम उठाने लगे हैं? यह सवाल अब किसी एक छात्रा, एक विश्वविद्यालय या एक शहर तक सीमित नहीं रह गया है। पूर्णिमा यूनिवर्सिटी की छात्रा की मौत के मामले में पुलिस जांच जारी है और घटना के पीछे की वास्तविक वजह अभी स्पष्ट नहीं हुई है। ऐसे में जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना गलत होगा। लेकिन यह घटना उस बड़े संकट की ओर जरूर इशारा करती है, जिसे राजस्थान लंबे समय से देख रहा है—छात्रों का बढ़ता मानसिक तनाव और आत्महत्या के मामले।पढ़ाई का दबाव निश्चित रूप से एक बड़ा कारण हो सकता है, लेकिन हर आत्महत्या को केवल परीक्षा या कम नंबरों से जोड़ देना भी समस्या को बहुत सरल बनाना होगा।
सरकारी स्तर पर भी छात्र आत्महत्याओं के पीछे करियर और पेशेवर समस्याएं, अकेलापन, पारिवारिक समस्याएं, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कठिनाइयां और अन्य सामाजिक कारणों को महत्वपूर्ण माना गया है। स्टूडेंट्स के सामने केवल परीक्षा पास करने का दबाव नहीं है। उसे अच्छे अंक चाहिए, प्रतिष्ठित संस्थान चाहिए, नौकरी चाहिए और जल्दी सफलता चाहिए। परिवार की उम्मीदें, समाज की तुलना और सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली तथाकथित सफलता भी मानसिक दबाव बढ़ा सकती है। कई स्टूडेंट घर से दूर हॉस्टल और पीजी में रहते हैं, जहां उनके आसपास सैकड़ों लोग होते हैं, लेकिन अपनी परेशानी सुनने वाला कोई नहीं होता।
सबसे बड़ा सवाल शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी का है। क्या कॉलेज और विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने और परीक्षा कराने की जगह हैं? क्या वहां विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को समझने वाली मजबूत काउंसलिंग व्यवस्था है? क्या शिक्षक ऐसे बदलाव पहचानने के लिए प्रशिक्षित हैं, जब कोई छात्र अचानक अकेला रहने लगे, पढ़ाई से दूर हो जाए या गहरे तनाव के संकेत देने लगे? केवल हादसा होने के बाद नए निर्देश जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। राजस्थान हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक छात्र आत्महत्याओं के मामलों पर चिंता जता चुके हैं। वर्षों से नीतियों, काउंसलिंग और निगरानी की चर्चा होती रही है, लेकिन हर नई घटना यह सवाल फिर खड़ा कर देती है कि जमीन पर व्यवस्था कितनी प्रभावी है?



