जयपुर (प्रज्ञा पांडे)। भारतीय फैशन की सबसे खास बात यही है कि यहां कई पुरानी परंपराएं समय के साथ नए अंदाज में वापस लौट आती हैं। सावन में लहरिया और कांच की चूड़ियां पहनना भी ऐसा ही हैं, जो सिर्फ पहनावे का हिस्सा नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, कला और भावनाओं से जुड़ी हुई हैं। लहरिया की पहचान उसकी लहरों जैसी डिजाइन और खूबसूरत रंगों से होती है। राजस्थान से जुड़ी यह पारंपरिक कला सदियों पुरानी मानी जाती है। इसे बनाने की खास तकनीक कपड़े को अलग-अलग तरीके से बांधकर और रंगकर तैयार की जाती है, जिससे उस पर लहरों जैसे पैटर्न बनते हैं।
लहरिया के रंग सिर्फ खूबसूरती नहीं दिखाते, बल्कि भारतीय संस्कृति में खुशियों, उत्सव और मौसम के बदलाव से भी जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि त्योहारों, शादियों और खास मौकों पर लोग इसे पहनना पसंद करते हैं। आज भी राजस्थानी पोशाकों से लेकर साड़ियों, सूट और इंडो-वेस्टर्न आउटफिट्स तक में लहरिया का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं, कांच की चूड़ियां भारतीय महिलाओं के श्रृंगार का एक बेहद खास हिस्सा रही हैं। इनकी खनक और रंगों को लंबे समय से शुभता, उत्सव और परंपरा से जोड़ा जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में चूड़ियों के रंग और उन्हें पहनने के तरीके भी संस्कृति को दर्शाते हैं।
कांच की चूड़ियों की खासियत यह है कि ये बेहद साधारण होते हुए भी पूरे लुक को बदल देती हैं। चाहे पारंपरिक साड़ी हो, लहंगा हो या फिर कोई सिंपल एथनिक ड्रेस, चूड़ियां पूरे पहनावे में एक अलग आकर्षण जोड़ देती हैं। आज के दौर में लहरिया और कांच की चूड़ियां सिर्फ पारंपरिक पहनावे तक सीमित नहीं हैं। फैशन डिजाइनर्स इन्हें नए रंगों, नए पैटर्न और मॉडर्न स्टाइल के साथ पेश कर रहे हैं। सोशल मीडिया और सेलिब्रिटी फैशन ने भी इन पुरानी कलाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है।
इनकी लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह यही है कि ये सिर्फ ट्रेंड नहीं हैं। इनके पीछे एक इतिहास है, एक कला है और एक भावनात्मक जुड़ाव है। यही कारण है कि हर नए फैशन दौर में लहरिया और कांच की चूड़ियां अपनी जगह फिर बना लेती हैं। कपड़े और गहने बदल सकते हैं, लेकिन जिन चीजों के पीछे संस्कृति और कहानी होती है, उनकी खूबसूरती कभी पुरानी नहीं होती।



