जयपुर। राजस्थान की राजधानी आज एक ऐतिहासिक आंदोलन की गवाह बन रही है। जैसलमेर के धोरों से शुरू हुई ‘ओरण बचाओ-गोचर बचाओ’ महारैली आज जयपुर की सड़कों पर अपना दम दिखा रही है। शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी की अगुवाई में हजारों पर्यावरण प्रेमी और ग्रामीण सीधे मुख्यमंत्री आवास (CM House) का रुख कर रहे हैं। हालांकि, इस रैली ने राजस्थान की सियासत में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
क्रेडिट की जंग: क्यों उठा रहे हैं विरोधी उंगली?
जैसे-जैसे यह महारैली जयपुर के करीब पहुंची, नेताओं के बीच जुबानी जंग तेज हो गई। हाल ही में बीजेपी प्रदेश महामंत्री ने भाटी की इस यात्रा पर निशाना साधते हुए कहा कि “एक व्यक्ति के कहने से कुछ नहीं होता।” सत्ता पक्ष की ओर से आरोप लगाया जा रहा है कि रविंद्र सिंह भाटी इस संवेदनशील मुद्दे पर केवल ‘राजनैतिक क्रेडिट’ लेना चाहते हैं।
वहीं, भाटी के समर्थकों का पलटवार बेहद तीखा है। उनका कहना है कि सरकार इस गंभीर मुद्दे पर काम करने के बजाय केवल ध्यान भटकाने वाले बयान दे रही है। समर्थकों के अनुसार, यह लड़ाई किसी व्यक्ति की नहीं बल्कि राजस्थान की पहचान और गोचर जमीन को बचाने की है।
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82 दिन और 700 किलोमीटर का संघर्ष
यह यात्रा कोई मामूली विरोध प्रदर्शन नहीं है। इसके पीछे 82 दिनों का कठिन परिश्रम और पसीना छुपा है:
शुरुआत: 21 जनवरी 2026 को जैसलमेर के तनोट माता मंदिर से।
सफर: कड़कड़ाती ठंड और रेगिस्तानी गर्मी के बीच जैसलमेर, बाड़मेर, जालौर, जोधपुर और अजमेर होते हुए पदयात्री जयपुर पहुंचे हैं।
मकसद: ओरण, गोचर और पारंपरिक जल स्रोतों को सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराना ताकि उन्हें अतिक्रमण से बचाया जा सके।
कॉरपोरेट बनाम संस्कृति: आखिर मांग क्या है?
आंदोलनकारियों का आरोप है कि पश्चिमी राजस्थान में सोलर और विंड एनर्जी की बड़ी कंपनियां पैर पसार रही हैं। इन कंपनियों को जमीन आवंटित करने के चक्कर में ओरण और गोचर भूमि का विनाश किया जा रहा है।
पदयात्रा टीम के सदस्य भोपाल सिंह भाटी ने बताया कि उनके संघर्ष से अब तक 17 हजार बीघा जमीन रिकॉर्ड में दर्ज हो चुकी है।
लेकिन अभी भी करीब 150 से ज्यादा फाइलें सचिवालय और कलेक्ट्रेट स्तर पर लंबित हैं। आरोप है कि बड़ी कंपनियों के दबाव में सरकार इन फाइलों को आगे नहीं बढ़ा रही है।
बगरू में दिखा जनसमर्थन: ‘जब तक जान, तब तक संघर्ष’
जयपुर पहुंचने से पहले जब यह यात्रा बगरू पहुंची, तो ग्रामीणों ने पलक-पावड़े बिछा दिए। ‘ओरण-देव जीवन’ के नारों से पूरा इलाका गूंज उठा। पदयात्रा के संयोजक सुमेर सिंह सावंता ने दो-टूक कहा कि तालाब, बावड़ियां और गोचर हमारी संस्कृति हैं और इन्हें बचाने के लिए हम आखिरी सांस तक संघर्ष करेंगे।
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आगे क्या? आर-पार की जंग
आज की यह महारैली भजनलाल सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। नवल सिंह देवड़ा और छोटू सिंह जाखड़ी जैसे प्रमुख चेहरों के साथ भाटी आज मुख्यमंत्री के सामने अपनी मांगें पुरजोर तरीके से रखेंगे।
बड़े सवाल:
क्या मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा इन लंबित फाइलों पर तुरंत फैसले लेंगे?
क्या सरकार कॉरपोरेट दबाव से बाहर निकलकर ओरण भूमि को संरक्षित करेगी?
या फिर यह आंदोलन आने वाले दिनों में और भी उग्र रूप लेगा?
राजस्थान की पारंपरिक जमीन और पर्यावरण को बचाने की यह जंग अब निर्णायक मोड़ पर है।



