देवस्थान विभाग के इंतजाम पुख्ता नहीं रहे। मुख्यमंत्री वरिष्ठ नागरिक यात्रा में बुजुर्गों को जो परेशानी हुई वो वाकई शर्मनाक है। थ्री स्टार की जगह धर्मशाला में ठूंसा गया और उनसे दुर्व्यवहार हुआ सो अलग। उदयपुर से विशेष ट्रेन गंगासागर करीब 970 वरिष्ठ नागिरकों को लेकर गई थी, लेकिन जाे दावे-वादे किए गए थे वो झूठे निकले। उम्र के जिस पड़ाव पर इंसान को सहारे, सम्मान और थोड़ी-सी अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है, उस उम्र में तीर्थयात्रा पर निकले बुजुर्गों को यदि घंटों परेशान होना पड़े तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी। वरिष्ठ नागरिकों की परेशानी ने सरकारी व्यवस्थाओं और जिम्मेदार लोगों की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े किए हैं। जिस यात्रा को बुजुर्गों के लिए आस्था और सुकून का अवसर बनना था, वह यदि अव्यवस्थाओं के कारण दुखद अनुभव में बदल जाए तो जवाबदेही तय होनी ही चाहिए।
मुख्यमंत्री वरिष्ठ नागरिक तीर्थ यात्रा योजना का उद्देश्य बुजुर्गों की धार्मिक आस्था पूरी करने में मदद करना है। आर्थिक या शारीरिक सीमाओं के कारण जो लोग अपने दम पर तीर्थस्थलों तक नहीं पहुंच सकते, उनके लिए ऐसी योजना उम्मीद बनकर आती है। लेकिन योजना का लाभ केवल यात्रा का टिकट उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं हो सकता। यात्रियों को सुरक्षित पहुंचाना, समय पर भोजन-पानी देना, विश्राम की व्यवस्था करना और जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है। सरकारी योजना के तहत बुजुर्गों को तीर्थस्थलों के दर्शन कराने का उद्देश्य सराहनीय है। लेकिन योजना की सफलता केवल यात्रियों को ट्रेन में बैठाकर गंतव्य तक पहुंचाने से तय नहीं होती। यात्रा शुरू होने से लेकर उनकी सुरक्षित वापसी तक सुविधाएं उपलब्ध कराना भी जिम्मेदार विभाग का दायित्व है। जब सैकड़ों वरिष्ठ नागरिक एक साथ यात्रा कर रहे हों, तब व्यवस्थाओं की निगरानी और भी जरूरी हो जाती है। आखिर भोजन, बसों, ठहरने और यात्रियों की सहायता का इंतजाम किसकी निगरानी में किया जा रहा था?
सबसे गंभीर सवाल कर्मचारियों के कथित दुर्व्यवहार को लेकर है। यदि बुजुर्ग अपनी परेशानी बताएं और उन्हें सहानुभूति देने के बजाय अनुचित व्यवहार झेलना पड़े, तो यह केवल सेवा में कमी नहीं, संवेदनशीलता का भी संकट है। वरिष्ठ नागरिक कोई एहसान लेने नहीं गए थे। वे उस सरकारी योजना के लाभार्थी थे, जिसके संचालन के लिए विभाग और संबंधित एजेंसियां जिम्मेदार हैं। उनकी शिकायत सुनना, सम्मान से बात करना और तत्काल मदद उपलब्ध कराना कर्मचारियों का न्यूनतम दायित्व था।
देवस्थान विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि यात्रा की व्यवस्थाओं की निगरानी किसने की, शिकायतों के समाधान के लिए कौन अधिकारी तैनात था और यात्रियों को समय पर सुविधाएं क्यों नहीं मिलीं। यदि कर्मचारियों या सेवा प्रदाताओं की लापरवाही सामने आती है, तो कार्रवाई भी होनी चाहिए। जांच केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए। यात्रियों से सीधे बातचीत करके उनकी शिकायतों की पुष्टि की जाए और भविष्य की यात्राओं के लिए जवाबदेही तय हो। सरकार को यह भी समझना होगा कि जनकल्याणकारी योजनाओं की प्रतिष्ठा विज्ञापनों और घोषणाओं से नहीं, लाभार्थियों के अनुभव से बनती है। बुजुर्गों के लिए तीर्थयात्रा आस्था और भावनाओं से जुड़ा अवसर है। इसे अव्यवस्थाओं और अपमान का अनुभव बना देना योजना के मूल उद्देश्य को ही कमजोर करता है। आखिर देवस्थान विभाग की जिम्मेदारी कहां खत्म होती है? क्या यात्रा की व्यवस्था किसी एजेंसी को सौंप देने के बाद विभाग जवाबदेही से मुक्त हो जाता है? ऐसा नहीं हो सकता।
सरकारी निगरानी का अर्थ ही यह है कि व्यवस्थाएं बिगड़ने से पहले उन्हें संभाला जाए और शिकायत आने पर तुरंत कार्रवाई हो। बुजुर्गों ने जो परेशानियां झेलने की बात कही है, उनका जवाब केवल आश्वासन से नहीं, ठोस कार्रवाई से मिलना चाहिए। तीर्थयात्रा पर गए वरिष्ठ नागरिकों को भगवान के दर्शन की संतुष्टि मिलनी चाहिए, व्यवस्था के प्रति शिकायत और अपमान की पीड़ा नहीं। इन वरिष्ठ नागरिकों की शिकायतों को महज अव्यवस्था मानकर टालना ठीक नहीं; उनके दर्द को समझना और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करना भी जरूरी है।



