Rajasthan CAG Report: जयपुर। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ताजा रिपोर्ट में कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिसने सरकारी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं. रिपोर्ट में सामने आया है कि राजस्थान में अपराधियों से जब्त किया करोड़ों रुपये का सोना-चांदी वर्षों से सरकारी खजाने में पड़ा है. वहीं, कुछ सरकारी विभाग 35 साल बाद भी करोड़ों रुपये के खर्च का पूरा हिसाब नहीं दे पाए हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों ने विभिन्न मामलों में जब्त किया गया 29.011 किलोग्राम सोना और 972.75 किलोग्राम चांदी, जिसे अदालतों ने राजकीय संपत्ति घोषित कर दिया था, उसका अब तक नियमानुसार निस्तारण नहीं किया गया है. इनकी अनुमानित कीमत 64.44 करोड़ रुपये है.
मूल्यांकन हुआ, लेकिन कार्रवाई नहीं
कैग के अनुसार, वित्त विभाग ने जब्त सोना-चांदी का मूल्यांकन तो करवा लिया, लेकिन मई 2025 तक भी उसे नियमों के अनुसार आगे की प्रक्रिया के लिए नहीं भेजा गया. नतीजतन यह बहुमूल्य संपत्ति अब भी राज्य के रिजर्व कोषागार में सुरक्षित रखी हुई है.
क्या कहते हैं नियम?
राजस्थान कोषागार नियमावली-2012 के नियम 122 के अनुसार, जयपुर का राज्य रिजर्व कोषागार अदालतों द्वारा राजकीय संपत्ति घोषित किए गए सोना, चांदी, हीरे और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं को सुरक्षित रखने का अधिकृत स्थान है. नियमों के मुताबिक, यदि कोई वस्तु पुरातात्विक महत्व की हो तो उसे पुरातत्व विभाग को सौंपा जाना चाहिए. अन्य सोना-चांदी को भारत सरकार की मुंबई स्थित टकसाल भेजकर शुद्ध धातु में परिवर्तित किया जाता है और बाद में उसकी बिक्री से सरकार को राजस्व प्राप्त होता है.
सुरक्षा पर बढ़ रहा अतिरिक्त खर्च
कैग ने कहा है कि मूल्यांकन के बावजूद वर्षों तक सोना-चांदी सुरक्षित कक्ष में पड़े रहने से सरकार पर सुरक्षा और रखरखाव का अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़ रहा है. रिपोर्ट में निदेशालय कोष एवं लेखा को जल्द निस्तारण की प्रक्रिया पूरी कराने की सिफारिश की गई है.
35 साल बाद भी नहीं मिला 29.79 करोड़ का हिसाब
रिपोर्ट में एक और गंभीर वित्तीय अनियमितता का उल्लेख किया गया है. कैग के मुताबिक, 17 एडवांस कंटीजेंसी (AC) बिलों का समायोजन अब तक लंबित है, जिनकी कुल राशि 29.79 करोड़ रुपये है. इनमें कुछ मामले वर्ष 1990-91 से लंबित हैं. यानी करीब 35 वर्ष बाद भी संबंधित विभाग यह स्पष्ट नहीं कर सके कि यह राशि किस उद्देश्य से खर्च की गई.
क्या होता है AC और DC बिल?
जब किसी विभाग को तत्काल खर्च के लिए राशि जारी की जाती है तो उसे एडवांस कंटीजेंसी (AC) बिल कहा जाता है. इसके बाद निर्धारित समय सीमा में संबंधित विभाग को डिटेल्ड कंटीजेंसी (DC) बिल प्रस्तुत करना होता है, जिसमें खर्च का पूरा विवरण दिया जाता है. कैग ने पाया कि 17 मामलों में यह प्रक्रिया पूरी नहीं की गई, जिससे सरकारी धन के उपयोग का सत्यापन संभव नहीं हो सका. इसे वित्तीय अनुशासन का गंभीर उल्लंघन माना गया है.
CAG की सिफारिश
कैग ने राज्य सरकार से सिफारिश की है कि जब्त सोना-चांदी का नियमानुसार जल्द निस्तारण कराया जाए और जिन विभागों ने वर्षों से डीसी बिल जमा नहीं किए हैं, उनसे तत्काल पूरा हिसाब लेकर लंबित मामलों का निपटारा किया जाए. रिपोर्ट में कहा गया है कि समय पर कार्रवाई नहीं होने से सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही प्रभावित हो रही है और सार्वजनिक धन के प्रबंधन पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
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