लोगों के भरोसे को कमाई का जरिया बनाया जा रहा है। बड़ों का ‘खास’ बताकर जनता को भरमाया जा रहा है। असली नेता-मंत्री के बजाय ऐसे ‘छुटभैये’ आमजन के साथ अफसर-कर्मचारियों पर रोब जमाकर उल्लू सीधा कर रहे हैं। हाल ही में प्रमोद शर्मा नामक एक ऐसे ही व्यक्ति का खुलासा हुआ था, जिसे अब पुलिस तलाश रही है। असल में वो झूठ बोल-बोलकर खुद को रुतबेदार बनाता फिर रहा था। पुलिस समेत कई विभाग के अफसर तक उसे सेल्यूट करते थे। सोमवार को पूर्व मंत्री महेश जोशी के खास माने जाने वाले संजय बड़ाया को गिरफ्तार किया गया। बहुचर्चित जल जीवन मिशन घोटाले में उनकी भूमिका बतौर दलाल बताई जा रही है। जोशी को तो जेल भेज दिया गया है, बड़ाया से अब एसीबी पूछताछ कर रही है। यह तो कुछ मामले आमजन के सामने इसलिए आ गए कि एफआईआर के बाद जांच सिलसिलेवार की गई।
हकीकत यह है कि जयपुर ही नहीं राजस्थान में ऐसे लोगों की लंबी फेहरिस्त है जो किसी विधायक-सांसद का भाई-भतीजा या साला-फूफा, नजदीकी रिश्तेदार-मित्र बनकर लोगों को ‘गुमराह ‘ कर रहे हैं। आलम तो यहां तक है कि मोहल्ले-कॉलोनी का ही कोई छुटभैया खुद को पार्षद-थाना इंचार्ज अथवा किसी सरकारी अफसर का खास बताकर काम कराने के ‘ठेके’ लेता है। कई ऐसे खास सोशल मीडिया पर इस तरह बड़ों के साथ खुद का फोटो डालकर रसूखदार बनने की कतार में हैं। पुलिस में दर्ज अधिकांश ठगी-धोखाधड़ी के मामलों में ऐसे ही छुटभैयों की संख्या अधिक होती है। आजकल हर शहर, कस्बे और सरकारी दफ्तर के आसपास कुछ ऐसे छुटभैये सक्रिय दिखाई देते हैं, जो खुद को किसी मंत्री, विधायक या बड़े अफसर का करीबी बताकर आम लोगों को गुमराह कर रहे हैं। कोई नौकरी लगवाने का दावा करता है, कोई ट्रांसफर कराने का भरोसा देता है, तो कोई सरकारी योजना या ठेका दिलाने के नाम पर पैसे ऐंठता है। सत्ता के नाम पर चल रही यह दलाली अब ठगी का संगठित कारोबार बनती जा रही है। सबसे दुखद बात यह है कि मजबूरी में फंसा आम आदमी जल्दी काम होने की उम्मीद में इनके झांसे में आ जाता है। सरकारी दफ्तरों की जटिल प्रक्रिया, अफसरों तक पहुंच की कमी और भ्रष्टाचार की बनी धारणा ऐसे लोगों को ताकत देती है। छुटभैये इसी कमजोरी का फायदा उठाकर जनता को भ्रमित करते हैं और अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। इन लोगों का तरीका भी बेहद चालाकी भरा होता है। नेताओं के साथ फोटो खिंचवाना, सोशल मीडिया पर बड़े लोगों के साथ वीडियो डालना, गाड़ियों पर राजनीतिक झंडे लगाना और अफसरों के नाम लेकर धौंस जमाना—यह सब जनता पर प्रभाव डालने के हथकंडे बन चुके हैं।
कई बार तो लोग डर या लालच में इनके सामने झुक भी जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसे लोगों का मनोबल बढ़ता क्यों जा रहा है? इसकी एक वजह राजनीतिक और प्रशासनिक ढिलाई भी है। कई नेता अपने आसपास ऐसे तत्वों को पालते-पोसते रहते हैं, क्योंकि चुनावी भीड़ जुटाने और निजी काम करवाने में ये उपयोगी साबित होते हैं। यही लोग बाद में सत्ता की आड़ लेकर वसूली और दबाव की राजनीति शुरू कर देते हैं। इस स्थिति का सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र और प्रशासन की विश्वसनीयता को होता है। जनता को लगने लगता है कि बिना सिफारिश या “सेटिंग” के कोई काम संभव नहीं। इससे ईमानदार व्यवस्था पर भी सवाल खड़े होने लगते हैं। जरूरत इस बात की है कि सरकार और पुलिस ऐसे मामलों में तुरंत कार्रवाई करें। यदि कोई व्यक्ति मंत्री या अफसर का नाम लेकर पैसे मांगता है या दबाव बनाता है, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही नेताओं को भी सार्वजनिक रूप से साफ करना चाहिए कि उनके नाम का दुरुपयोग करने वालों को संरक्षण नहीं मिलेगा। जनता को भी समझना होगा कि लोकतंत्र में काम नियमों से होते हैं, किसी छुटभैये की सिफारिश से नहीं। जिस दिन लोग ऐसे दलालों से दूरी बनाना शुरू कर देंगे, उसी दिन सत्ता के नाम पर चल रही ठगी की यह दुकान बंद होने लगेगी। नेता-मंत्री हों या किसी विभाग का अफसर, उन्हें यह तो देखना चाहिए कि जो व्यक्ति उनके पास ज्यादा आ-जा रहा है, इधर-उधर के काम ला रहा है, उसकी असल स्थिति क्या है। आमजन के बीच खुद की छवि खराब होने से बचाने के लिए ऐसे लोगों को पहचानना होगा जो किसी मंत्री-नेता या अफसर के खास बनने का दावा करते साधारण लोगों को चूना लगाते हैं।



