मुंबई(प्रज्ञा पांडे)। 1960 का दशक, एक जरी की फैक्ट्री का बड़ा-सा हॉल, रात गहरा चुकी है, फर्श पर करीब चालीस लोग एक-दूसरे से सटकर सो रहे हैं,उन्हीं के बीच एक दुबला-पतला लड़का भी लेटा है…सिरहाने कोई तकिया नहीं, जेब में गिने-चुने रुपये और आंखों में एक ऐसा सपना, जिसे दुनिया हकीकत से कोसों दूर मानती थी। उस लड़के के पिता चाहते थे कि वह डॉक्टर बने, सेना में जाए या कोई बड़ा सरकारी अफसर बने। उन्होंने उसके लिए नेशनल डिफेंस अकादमी का फॉर्म तक भरवा दिया था। लेकिन बेटे के मन में सिर्फ एक ही सपना था…एक्टर बनने का। वह जानता था कि इस सपने को सच करने का रास्ता सिर्फ मुंबई होकर गुजरता है। दसवीं पास करने के बाद उसने कॉलेज में दाखिला तो ले लिया, लेकिन उसका मन किताबों से ज्यादा सिनेमाघरों में लगता था। कॉलेज की फीस के पैसे भी फिल्मों पर खर्च होने लगे। फिर एक दिन उसने वही फीस मुंबई जाने के टिकट पर खर्च कर दी। यह सिर्फ एक शहर बदलने का फैसला नहीं था, बल्कि उस जिंदगी के खिलाफ बगावत थी, जो उसके लिए पहले से तय कर दी गई थी।
मुंबई पहुंचकर उसे जल्दी ही एहसास हो गया कि सपनों का शहर हर किसी का खुले दिल से स्वागत नहीं करता। जिस परिचित परिवार के भरोसे वह यहां आया था, वह खुद बेहद साधारण हालात में रह रहा था। कुछ दिन रिश्तेदारों के यहां गुजरे, लेकिन वहां भी ज्यादा दिन ठहरना संभव नहीं था। आखिरकार उसे एक जरी कढ़ाई की फैक्ट्री के बड़े-से हॉल में शरण मिली, जहां हर रात तीस-चालीस मजदूर फर्श पर सोते थे और वह भी उन्हीं के बीच अपनी रातें गुजारता था। दिनभर वह काम की तलाश में भटकता। कभी ताज होटल में बेलबॉय बनने की कोशिश करता, कभी वेटर की नौकरी के लिए आवेदन देता, लेकिन हर जगह निराशा ही हाथ लगती। जेब खाली थी, भविष्य धुंधला था, लेकिन सपने अब भी जिंदा थे। इसी संघर्ष के बीच एक दिन उसे फिल्मों में एक्स्ट्रा कलाकार का काम मिला। फिल्म थी अमन और मेहनताना था सिर्फ साढ़े सात रुपये। उसका किरदार इतना छोटा था कि शायद दर्शकों की नजर भी उस पर न पड़ी हो, लेकिन उसके लिए कैमरे के सामने खड़ा होना किसी बड़ी जीत से कम नहीं था। बाद में वह मजाक में कहा करते थे कि फिल्म में उनके और भी सीन थे, लेकिन उनकी एक्टिंग इतनी अच्छी थी कि सब काट दिए गए।
मुंबई में संघर्ष के दिनों में उनकी मुलाकात अपने आदर्श अभिनेता दिलीप कुमार से भी हुई। उन्हें उम्मीद थी कि शायद वह कोई रास्ता दिखाएंगे, लेकिन दिलीप कुमार ने सलाह दी कि अच्छे परिवारों के लड़कों को फिल्म इंडस्ट्री में नहीं आना चाहिए। यह बात किसी और का हौसला तोड़ सकती थी, लेकिन नसीरुद्दीन शाह के लिए यह सिर्फ एक और चुनौती थी। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के दिनों में उनकी मुलाकात परवीन मुराद से हुई। वह पाकिस्तान की नागरिक थीं और भारत में मेडिकल की पढ़ाई कर रही थीं। उस दौर में दोनों देशों के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण थे और परवीन का वीजा खत्म होने वाला था। अगर वह लौट जातीं, तो शायद दोबारा भारत न आ पातीं। ऐसे में दोनों ने बेहद सादगी और गोपनीयता के साथ निकाह कर लिया। इस शादी में परिवार का कोई सदस्य मौजूद नहीं था। जब यह खबर घर पहुंची तो पिता बेहद नाराज हुए, जबकि मां ने सिर्फ इतना पूछा, “अगर तुम हमें बता देते, तो क्या हम मना कर देते?” यह सवाल नसीरुद्दीन शाह के मन में लंबे समय तक गूंजता रहा।
कुछ समय बाद उनकी बेटी हीबा का जन्म हुआ। अपनी आत्मकथा में नसीरुद्दीन शाह ने ईमानदारी से स्वीकार किया है कि उस समय उन्हें बेटी होने की खबर सुनकर खुशी नहीं हुई थी। उन्होंने बेटे की कल्पना कर रखी थी और उसी उम्मीद में जी रहे थे। बाद में उन्होंने माना कि वह सोच पूरी तरह गलत थी। अपनी कमियों को स्वीकार करने की उनकी यह ईमानदारी उन्हें दूसरे कलाकारों से अलग बनाती है। उनकी जिंदगी का सबसे दर्दनाक पल तब आया, जब उनके पिता का निधन हुआ। उस समय उनके पास दिल्ली जाने तक के पैसे नहीं थे। उन्होंने रत्ना पाठक से 500 रुपये उधार लिए और एयरपोर्ट पहुंचे, लेकिन सभी फ्लाइटें भर चुकी थीं। वह अपने पिता की आखिरी विदाई में शामिल नहीं हो सके। बाद में जब वह सरधना पहुंचे, तो पिता की कब्र के सामने बैठकर उन्होंने वह सारी बातें कहीं, जो जीते-जी कभी नहीं कह पाए थे। यह उनके जीवन का ऐसा अध्याय है, जिसे पढ़ते हुए आज भी आंखें नम हो जाती हैं। बाद में जब उन्होंने रत्ना पाठक से शादी करने का फैसला किया, तो उनकी मां ने सिर्फ एक सवाल पूछा क्या रत्ना इस्लाम कबूल करेंगी? नसीरुद्दीन शाह का जवाब साफ था “नहीं।” उन्होंने कहा कि शादी प्यार से होगी, किसी की पहचान या धर्म बदलकर नहीं। यही सोच उनके रिश्ते की सबसे मजबूत बुनियाद बनी। साल 1977 में उनकी जिंदगी ने एक और अप्रत्याशित मोड़ लिया। एक रेस्तरां में अपने दोस्त और अभिनेता ओम पुरी के साथ खाना खाते समय उनके पुराने मित्र राजेंद्र जसपाल ने पीछे से उन पर चाकू से हमला कर दिया। कहा गया कि वह नसीरुद्दीन शाह की सफलता से जलने लगे थे। ओम पुरी ने तुरंत उन्हें बचाया और बड़ा हादसा टल गया। बाद में मामला अदालत तक पहुंचा, लेकिन नसीरुद्दीन शाह ने केस आगे नहीं बढ़ाया। उन्होंने बदले के बजाय आगे बढ़ना चुना।
नसीरुद्दीन शाह सिर्फ अपने अभिनय के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी बेबाक राय के लिए भी जाने जाते हैं। उन्होंने समय-समय पर बॉलीवुड के कई बड़े सितारों पर खुलकर टिप्पणी की। उनके बयान विवादों में रहे, लेकिन उन्होंने कभी अपनी बात कहने से परहेज नहीं किया। यही स्पष्टवादिता उनके व्यक्तित्व का एक अहम हिस्सा बन गई। आज, 76 साल की उम्र में, नसीरुद्दीन शाह सिर्फ एक अभिनेता नहीं हैं। वह अभिनय की एक ऐसी पाठशाला हैं, जिससे हर पीढ़ी के कलाकार कुछ न कुछ सीखती है। उन्होंने 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया, अनगिनत यादगार किरदार निभाए और साबित किया कि महान अभिनेता बनने के लिए सिर्फ लोकप्रिय होना जरूरी नहीं, बल्कि अपने हर किरदार में सच्चाई और ईमानदारी लाना जरूरी है। जिस लड़के ने कभी मुंबई की एक फैक्ट्री के फर्श पर रातें बिताई थीं, जिसे पहली कमाई के तौर पर सिर्फ साढ़े सात रुपये मिले थे और जो अपने पिता की आखिरी विदाई तक में शामिल नहीं हो पाया, वही आज भारतीय सिनेमा के इतिहास में अभिनय की सबसे ऊंची चोटियों में गिना जाता है। कुछ लोग सिर्फ स्टार बनते हैं, लेकिन नसीरुद्दीन शाह ने अपनी कला से खुद को एक ऐसी विरासत में बदल दिया, जिसकी चमक आने वाली कई पीढ़ियों तक कायम रहेगी।



