जयपुर नगर निगम के महापौर पद के लिए तस्वीर अब साफ हो गई है। भाजपा की ओर से सुनील कोठारी और कांग्रेस की ओर से सुनीता गुप्ता मावर ने नामांकन दाखिल कर दिया है। नामांकन के साथ ही दोनों दलों ने अपनी-अपनी जीत के दावे भी शुरू कर दिए हैं। लेकिन इस सियासी मुकाबले में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ संख्या बल का नहीं, बल्कि गुटबाजी और पार्षदों को एकजुट रखने का है। नगर निगम में भाजपा के पास 78 पार्षद हैं, जबकि कांग्रेस के पास 53 पार्षद हैं। 15 निर्दलीय पार्षद भी इस पूरे समीकरण को महत्वपूर्ण बनाते हैं।
भाजपा के सामने चुनौती
भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने स्पष्ट बहुमत को एकजुट वोट में बदलने की होगी। 78 पार्षदों का आंकड़ा पार्टी को मजबूत स्थिति में रखता है, लेकिन मेयर चुनाव में क्रॉस वोटिंग की आशंका ने पार्टी के भीतर की राजनीतिक खींचतान को चर्चा में ला दिया है। नाम तय होने से पहले भी भाजपा में कई नामों को लेकर मंथन और असहमति की खबरें सामने आई थीं। अब सुनील कोठारी के सामने चुनौती सिर्फ विपक्ष का मुकाबला करने की नहीं, बल्कि संगठन, पार्षदों और अलग-अलग राजनीतिक समूहों को साथ लेकर चलने की भी होगी।
कांग्रेस के सामने चुनौती और बड़ी
कांग्रेस के लिए चुनौती संख्या बल से शुरू होती है। उसके पास भाजपा से कम पार्षद हैं, इसलिए पार्टी को अपने पार्षदों को पूरी तरह एकजुट रखने के साथ निर्दलीय पार्षदों के समीकरण पर भी नजर रखनी होगी। सुनीता गुप्ता मावर के नाम पर भी पार्टी के भीतर अलग-अलग दावेदारियों और धड़ों की चर्चा नामांकन से पहले सामने आई। ऐसे में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पार्टी अपने भीतर के मतभेदों को पीछे छोड़कर एकजुट होकर चुनाव लड़ पाएगी?
असली मुकाबला यहीं
ऐसे में जयपुर मेयर चुनाव में मुकाबला सिर्फ सुनील कोठारी बनाम सुनीता गुप्ता मावर का नहीं है। असली परीक्षा दोनों दलों के संगठन की भी है। भाजपा के सामने सवाल—78 का आंकड़ा क्या एकजुट वोट में बदलेगा? कांग्रेस के सामने सवाल—कम संख्या के बावजूद क्या वह अपने पार्षदों और संभावित निर्दलीय समर्थन को एकजुट कर पाएगी? और इन दोनों सवालों के बीच सबसे बड़ा सवाल— क्या मेयर की कुर्सी तक पहुंचने से पहले दोनों पार्टियां अपनी-अपनी गुटबाजी से पार पा पाएंगी? नामांकन के बाद अब नजर 25 सितंबर को होने वाले महापौर चुनाव पर है।



