मणिपुर में हालात सुधर नहीं रहे। लोगों को अपने गांव छोड़कर दूसरी जगह शरण लेनी पड़ रही है। संदिग्ध उग्रवादी सूने पड़े घरों में आग लगा रहे हैं। मणिपुर में जातीय हिंसा शुरू हुए तीन साल से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन हालात अब भी सामान्य नहीं हो पाए हैं। मणिपुर में हिंसा का बार-बार लौटना केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि शासन पर सवाल खड़ा करता है। जब भी लगता है कि हालात सामान्य होने की ओर बढ़ रहे हैं, तनाव और हिंसा की घटनाएं फिर चिंता बढ़ाने लगती हैं। सवाल है कि आखिर ऐसा क्या है कि इतने लंबे समय बाद भी मणिपुर में स्थायी शांति का रास्ता नहीं निकल पाया है? क्या हिंसा रोकने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती और कर्फ्यू जैसे कदम पर्याप्त हैं, या फिर विवाद की जड़ों तक पहुंचना भी जरूरी है?
मणिपुर का विवाद कोई एक दिन में पैदा नहीं हुआ। मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय तनाव, जमीन और आरक्षण से जुड़े सवाल, पहाड़ी तथा घाटी क्षेत्रों के अधिकारों को लेकर आशंकाएं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की चिंताएं इस संकट के प्रमुख पहलुओं में शामिल हैं। मई 2023 में भड़की जातीय हिंसा ने इन मतभेदों को भयावह रूप दे दिया। लोगों की जान गई, हजारों परिवार विस्थापित हुए और अनेक लोगों को अपने घर छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। घरों, धार्मिक स्थलों और संपत्तियों को नुकसान पहुंचा। सबसे बड़ी चोट उन लोगों को लगी, जिनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन उन्हें अपने ही प्रदेश में असुरक्षा के बीच जीवन बिताना पड़ा।
मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति दर्जे की मांग को लेकर मणिपुर हाईकोर्ट के 2023 के आदेश के बाद तनाव बढ़ा था। कुकी समुदाय के एक हिस्से ने इस मांग को अपने भूमि अधिकारों और संवैधानिक संरक्षण के लिए खतरे के रूप में देखा। दूसरी ओर, पहाड़ी और घाटी क्षेत्रों की अलग-अलग ऐतिहासिक, सामाजिक और प्रशासनिक परिस्थितियों ने अविश्वास को और गहरा किया। लेकिन मणिपुर का संकट अब मैतेई और कुकी समुदायों के बीच तनाव तक सीमित नहीं रह गया है। वर्ष 2026 में नागा और कुकी-जो समुदायों के बीच भी हिंसा बढ़ी।
आखिर शांति की कोशिशें बार-बार नाकाम क्यों हो रही हैं? इसकी एक बड़ी वजह समुदायों के बीच गहराता अविश्वास है। जब लोग दूसरे समुदाय को अपने लिए खतरा मानने लगते हैं, तो बातचीत के रास्ते बंद होने लगते हैं। हिंसा की एक घटना का बदला लेने के लिए दूसरी घटना होती है और फिर प्रतिशोध का सिलसिला चल पड़ता है। हथियारबंद समूहों की सक्रियता, सड़कों की नाकेबंदी, आवागमन में बाधा और अलग-अलग इलाकों में असुरक्षा की भावना इस संकट को और जटिल बना रही है। ऐसे हालात में केवल सुरक्षा बल भेजकर शांति कायम करने की कोशिश तब तक अधूरी रहेगी, जब तक हिंसा करने वालों पर प्रभावी कार्रवाई और प्रभावित समुदायों के बीच संवाद साथ-साथ नहीं चलते।
केंद्र और राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शांति को सिर्फ सरकारी बयान या कुछ दिनों तक हिंसा न होने के आधार पर नहीं आंका जा सकता। वास्तविक शांति तब मानी जाएगी, जब विस्थापित परिवार सम्मान के साथ अपने घर लौट सकें, बच्चों की पढ़ाई सामान्य हो, व्यापार और रोजगार फिर पटरी पर आएं और लोग बिना भय के एक जिले से दूसरे जिले में जा सकें। हिंसा के मामलों की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों को सजा मिले और पीड़ितों को न्याय तथा पर्याप्त पुनर्वास मिले। किसी भी समुदाय की शिकायत को नजरअंदाज करना या किसी एक पक्ष की चिंताओं को ही प्राथमिकता देना समाधान को और दूर कर सकता है।



