Thursday, July 16, 2026
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जगन्नाथ रथ यात्रा: आस्था से आगे की कहानी…जब भगवान को आया बुखार, पत्नी ने बंद कर दिए मंदिर के द्वार!

करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी पुरी रथ यात्रा के पीछे छिपी हैं कई अनसुनी कहानी और परंपराएं। जहां बीमारी, प्रेम, रूठना-मनाना और सदियों पुराने रहस्य एक साथ दिखाई देते हैं। जानिए जगन्नाथ रथ यात्रा की वो कहानियां, जिनमें भगवान इंसानों के बेहद करीब नजर आते हैं।

(प्रज्ञा पांडे)। एक ऐसा समंदर, जहाँ पानी की लहरें नहीं बल्कि इंसानों का हुजूम उमड़ता है। गूंजते हुए शंख, बजते झांझ-मंजीरे और आसमान को चीरती हुई एक ही गूंज “जय जगन्नाथ!” ओडिशा के पुरी में हर साल निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति, लोककथाओं और मानवीय भावनाओं का ऐसा अद्भुत संगम है, जिसमें भगवान सिर्फ पूजे नहीं जाते वे इंसानों की तरह जीते भी हैं। यही वजह है कि इस यात्रा में भगवान बीमार पड़ते हैं, छुट्टियां मनाने जाते हैं, पत्नी को नाराज़ कर देते हैं और आखिर में रसगुल्ला खिलाकर उन्हें मनाते हैं।

जहाँ विज्ञान भी घुटने टेक देता है


कहानियों पर आने से पहले बात करते हैं पुरी के मुख्य मंदिर (श्री मंदिर) की। यहाँ कुछ ऐसी चीजें चौबीसों घंटे होती हैं, जिन्हें आज का आधुनिक विज्ञान भी ‘इम्पॉसिबल’ मानता है।

हवा के विपरीत लहराता झंडा: मंदिर के शिखर पर लगा विशाल ध्वज हमेशा हवा की दिशा के उलट लहराता है। ऐसा क्यों है? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
गुमशुदा परछाई: तपती धूप हो या दोपहर के 12 बजे हों, मंदिर के मुख्य गुंबद की परछाई ज़मीन पर कभी नहीं बनती।
नो-फ्लाई ज़ोन: इस मंदिर के ऊपर से न तो कोई हवाई जहाज़ गुज़र सकता है और न ही आज तक किसी पक्षी को मंदिर के गुंबद पर बैठे या ऊपर उड़ते देखा गया है।
समंदर की खामोशी: मंदिर का मुख्य द्वार ‘सिंहद्वार’ है। आप जैसे ही सिंहद्वार के अंदर कदम रखते हैं, बाहर चल रही समंदर की लहरों की तेज़ आवाज़ एकदम गायब हो जाती है।

अगर आपने ध्यान दिया हो, तो भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियाँ लकड़ी की बनी हैं और देखने में अधूरी लगती हैं। न उनके पूरे हाथ हैं, न पैर, और आँखें बहुत बड़ी-बड़ी हैं। इसके पीछे की कहानी बेहद भावुक करने वाली है। पौराणिक कथा के अनुसार राजा इंद्रद्युम्न ने जब भगवान की मूर्तियाँ बनवानी चाहीं, तो देवताओं के शिल्पी ‘भगवान विश्वकर्मा’ एक बूढ़े बढ़ई का रूप धरकर आए। उन्होंने एक शर्त रखी “मैं 21 दिन तक बंद कमरे में मूर्ति तराशूँगा, कोई दरवाज़ा नहीं खोलेगा।” लेकिन 14 दिन बाद जब कमरे से आवाज़ आनी बंद हो गई, तो रानी को चिंता हुई कि बूढ़ा बढ़ई कहीं मर न गया हो। उनके दबाव में राजा ने दरवाज़ा खोल दिया। शर्त टूटते ही विश्वकर्मा गायब हो गए और मूर्तियाँ अधूरी रह गईं। राजा रोने लगे, तब भगवान ने आकाशवाणी में कहा “रोओ मत! मैं इस अधूरे रूप में ही रहना चाहता हूँ, ताकि दुनिया को बता सकूँ कि जो इंसान खुद अधूरा, या टूटा है, मैं उसका भी हूँ। मुझे पाने के लिए परफेक्ट होने की नहीं, सिर्फ सच्चे प्रेम की ज़रूरत है।”

भगवान भी पड़ते हैं बीमार


रथ यात्रा से पहले ज्येष्ठ पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का भव्य स्नान पूर्णिमा उत्सव होता है। परंपरा के अनुसार तीनों विग्रहों को 108 कलशों के जल से स्नान कराया जाता है। मान्यता है कि इसके बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। अगले 14 दिनों तक मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं। इस अवधि को अनासर कहा जाता है। इन दिनों भगवान को औषधीय पेय और हल्का भोग चढ़ाया जाता है। श्रद्धालु मानते हैं कि भगवान स्वास्थ्य लाभ के बाद ही रथ यात्रा के लिए निकलते हैं।

जब भगवान चले जाते हैं मौसी के घर


रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ भव्य रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं, जिसे स्थानीय परंपरा में भगवान की मौसी का घर माना जाता है। लेकिन इस यात्रा की सबसे दिलचस्प बात यह है कि माता लक्ष्मी इस यात्रा में साथ नहीं जातीं। यहीं से शुरू होती है एक ऐसी परंपरा, जो भगवान को बेहद मानवीय रूप में प्रस्तुत करती है।

रथ यात्रा के पांचवें दिन हेरा पंचमी मनाई जाती है।


परंपरा के अनुसार माता लक्ष्मी भगवान को वापस बुलाने गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं। जब भगवान तुरंत लौटते नहीं, तो नाराज़ होकर प्रतीकात्मक रूप से उनके रथ को क्षति पहुंचाने की रस्म निभाई जाती है। इसके बाद जब नौ दिन की यात्रा समाप्त होती है और भगवान वापस श्रीमंदिर लौटते हैं, तब भी उनकी परीक्षा खत्म नहीं होती। नीलाद्रि बीजे के दौरान मान्यता है कि माता लक्ष्मी पहले मंदिर का द्वार बंद कर देती हैं। भगवान की ओर से पुजारी उन्हें मनाते हैं और अंततः रसगुल्ला अर्पित किया जाता है। यही वजह है कि ओडिशा में नीलाद्रि बीजे और रसगुल्ले का संबंध बेहद खास माना जाता है।

दुनिया की सबसे बड़ी रसोई


पुरी श्रीमंदिर की रसोई विश्व की सबसे विशाल मंदिर रसोइयों में गिनी जाती है। हर दिन हजारों श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसाद तैयार किया जाता है। यहां मिट्टी के बर्तनों में पारंपरिक तरीके से भोजन पकाया जाता है। इस रसोई से जुड़ी कई रोचक मान्यताएं भी प्रचलित हैं, जिनमें सबसे ऊपर रखे बर्तन के पहले पकने की कथा सबसे प्रसिद्ध है।

जहां राजा भी बन जाता है सेवक


रथ यात्रा का सबसे भावुक दृश्य तब दिखाई देता है, जब पुरी के गजपति महाराजा स्वयं सोने की झाड़ू लेकर भगवान के रथ के सामने सफाई करते हैं। इस परंपरा को चेरा पहंरा कहा जाता है। यह संदेश देती है कि भगवान के सामने राजा और सामान्य व्यक्ति में कोई अंतर नहीं। आस्था का सबसे मानवीय उत्सव जगन्नाथ रथ यात्रा शायद दुनिया का इकलौता ऐसा धार्मिक उत्सव है, जहां भगवान सिर्फ आराध्य नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह दिखाई देते हैं। वे बीमार पड़ते हैं, घर से बाहर जाते हैं, रूठते हैं। मनाते हैं और आखिर में प्रेम ही जीतता है। यही कारण है कि सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी करोड़ों लोगों को पुरी की ओर खींच लाती है। जय जगन्नाथ।

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