Thursday, August 20, 2026
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सजा भी, सुधार भी: कोटा में दुष्कर्म के दोषी किशोर को 20 साल की कैद, रोज करनी होगी 2 घंटे पढ़ाई और 3 घंटे पौधरोपण

कोटा की पॉक्सो कोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म के दोषी 17 वर्षीय किशोर को 20 साल की सजा सुनाई है। कोर्ट ने फैसले में सजा के साथ सुधार का मौका देते हुए 21 साल की उम्र तक रोज 2 घंटे पढ़ाई और 3 घंटे पौधरोपण व समाज सेवा का अनोखा आदेश दिया है।

कोटा: राजस्थान के कोटा स्थित पॉक्सो (POCSO) कोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म के एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए न्याय प्रणाली में ‘सजा के साथ सुधार’ की एक नई नजीर पेश की है। अदालत ने 17 वर्षीय दोषी किशोर को 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है, लेकिन साथ ही उसकी उम्र और भविष्य को ध्यान में रखते हुए सुधारात्मक कदम उठाने के विशेष निर्देश भी दिए हैं। पॉक्सो कोर्ट क्रम-2 के न्यायाधीश पवन अग्रवाल ने दोषी की मानसिक और शारीरिक स्थिति का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद यह अनूठा आदेश जारी किया।

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21 साल की उम्र तक बाल सुधार गृह में रहेगा दोषी

अदालत के आदेशानुसार, जब तक दोषी किशोर 21 वर्ष का नहीं हो जाता, तब तक उसे सामान्य जेल में भेजने के बजाय बाल सुधार गृह में रखा जाएगा। 21 साल की आयु पूरी होने के बाद ही उसे 20 साल की शेष सजा काटने के लिए केंद्रीय कारागार (जेल) में स्थानांतरित किया जाएगा। बाल सुधार गृह में प्रवास के दौरान दोषी को रोजाना अनिवार्य रूप से 5 घंटे निम्नलिखित सुधारात्मक कार्यों में बिताने होंगे:

  • 2 घंटे अनिवार्य पढ़ाई: सुधार गृह के अधीक्षक की देखरेख में दोषी को प्रतिदिन 2 घंटे किसी तकनीकी या शैक्षणिक संस्थान में शिक्षा ग्रहण करनी होगी।
  • 2 घंटे पौधरोपण: जिला वन अधिकारी (DFO) या संबंधित विभाग की निगरानी में उसे रोजाना 2 घंटे पौधरोपण और पर्यावरण संरक्षण का कार्य करना होगा।
  • 1 घंटे निस्वार्थ समाज सेवा: प्रतिदिन शाम को 1 घंटे किसी आश्रय स्थल या ‘अपना घर’ जैसी सामाजिक संस्था में सामाजिक कार्यकर्ता की देखरेख में सेवा देनी होगी।

नानी के घर ले जाकर किया था दुष्कर्म

मामला 16 सितंबर 2024 का है। 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली 15 वर्षीय पीड़िता और आरोपी के बीच पिछले कुछ वर्षों से बातचीत थी। वारदात की रात आरोपी नाबालिग पीड़िता को बहला-फुसलाकर अपनी नानी के घर ले गया। वहां उसने छात्रा को 4-5 दिनों तक बंधक बनाकर रखा और उसके साथ दुष्कर्म किया।

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न्याय प्रणाली में सुधारात्मक कदम की मिसाल

अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोषी पर 6 हजार रुपये का आर्थिक जुर्माना भी लगाया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला दर्शाता है कि बाल अपराधियों के मामलों में न्यायपालिका का मुख्य उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि उनकी मानसिकता में सकारात्मक बदलाव लाकर उन्हें समाज की मुख्यधारा में लौटने का अवसर देना भी है।

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