तेहरान। मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच अब दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक हॉरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर नई कूटनीतिक हलचल शुरू हो गई है। ईरान ने इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों पर 7 प्रतिशत शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। इस कदम ने वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान का मानना है कि इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा और संचालन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है, इसलिए यहां से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क लिया जाना उचित होगा। दूसरी ओर, अमेरिका इस प्रस्ताव का विरोध कर रहा है और चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के जारी रहे।
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चीन और रूस को राहत देने का प्रस्ताव
रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान ने अपने प्रस्ताव में चीन और रूस के जहाजों को इस संभावित शुल्क से छूट देने की बात कही है। वहीं ओमान दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए शुल्क को कम कर लगभग 3 प्रतिशत करने के विकल्प पर बातचीत की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो इसका असर केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।
ईरान इसे मान रहा बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि
ईरानी अधिकारियों के अनुसार, यह प्रस्ताव फारस की खाड़ी में ईरान की रणनीतिक भूमिका को और मजबूत करेगा। उनका दावा है कि इससे समुद्री मार्ग पर देश का प्रभाव बढ़ेगा और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में ईरान की स्थिति मजबूत होगी। हालांकि, बातचीत से जुड़े कुछ सूत्रों का कहना है कि फिलहाल यह प्रक्रिया शुरुआती और संवेदनशील चरण में है। अंतिम सहमति बनने से पहले कई दौर की बातचीत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विचार-विमर्श होना बाकी है।
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दुनिया के लिए क्यों महत्वपूर्ण है हॉरमुज जलडमरूमध्य?
हॉरमुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री लाइनों में गिना जाता है। दुनिया के समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल और तरल प्राकृतिक गैस (LNG) का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का अतिरिक्त शुल्क, तनाव या व्यवधान सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में इस तरह का शुल्क लागू होता है तो शिपिंग कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। इसका असर तेल, गैस और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है। भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल ईरान का यह प्रस्ताव चर्चा के केंद्र में है और इस पर विभिन्न देशों के बीच बातचीत जारी रहने की संभावना है। आने वाले दिनों में अमेरिका, खाड़ी देशों और अन्य अंतरराष्ट्रीय पक्षों की प्रतिक्रिया के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह प्रस्ताव व्यवहारिक रूप लेता है या नहीं। तब तक वैश्विक बाजार और ऊर्जा क्षेत्र की निगाहें हॉरमुज जलडमरूमध्य पर टिकी रहेंगी।



