Thursday, September 10, 2026
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क्या चीन और रूस मिलकर खत्म कर रहे हैं डॉलर का राज? अमेरिका की बादशाहत पर मंडराया खतरा!

चीन और रूस के बीच युआन-रूबल में बढ़ता व्यापार अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व के लिए चुनौती बन रहा है। BRICS और भारत का संतुलित रुख वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बड़े बदलाव के संकेत दे रहा है।

नई दिल्ली। अमेरिका भले ही आज भी दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्तियों में शामिल है, लेकिन वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में चीन तेजी से अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है। खासकर रूस और चीन के बीच बढ़ता स्थानीय मुद्रा व्यापार अमेरिकी डॉलर के लंबे समय से चले आ रहे वर्चस्व के लिए एक अहम चुनौतीरूस और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। खासकर रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के तौर पर देखा जा रहा है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंध, रूस के खिलाफ आर्थिक पाबंदियां, बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और दुनिया में बन रहे नए आर्थिक गुटों ने कई देशों को डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए प्रेरित किया है। इसी बदलाव को De-Dollarization यानी डॉलर पर निर्भरता कम करने की प्रक्रिया कहा जा रहा है।

चीन-रूस की जुगलबंदी से डॉलर को चुनौती

रूस और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। खासकर रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद दोनों देशों के बीच डॉलर और यूरो की भूमिका काफी कम हुई है। रूस से चीन को होने वाले तेल, प्राकृतिक गैस और कोयले जैसे प्रमुख निर्यातों के भुगतान में युआन और रूबल का इस्तेमाल बढ़ा है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार में अमेरिकी डॉलर की जरूरत कम होती है। हालांकि, इसे सीधे तौर पर डॉलर के अंत की शुरुआत कहना जल्दबाजी होगी। यह फिलहाल मुख्य रूप से चीन और रूस के बीच बढ़ते आर्थिक सहयोग तथा पश्चिमी वित्तीय प्रणाली से अलग विकल्प तैयार करने की रणनीति का हिस्सा है।

चीन और रूस ने तैयार किए वैकल्पिक भुगतान सिस्टम

रूस को SWIFT से बाहर किए जाने के बाद मॉस्को ने अपने SPFS (System for Transfer of Financial Messages) को आगे बढ़ाया। दूसरी तरफ चीन का CIPS (Cross-Border Interbank Payment System) अंतरराष्ट्रीय युआन लेनदेन के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा बन रहा है। इन प्रणालियों का उद्देश्य देशों को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए पश्चिमी वित्तीय नेटवर्क पर पूरी तरह निर्भर रहने से बचाना है। चीन अपनी डिजिटल करेंसी और डिजिटल भुगतान infrastructure को भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए विकसित कर रहा है। यदि इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर बढ़ता है, तो भविष्य में सीमा-पार भुगतान व्यवस्था में बदलाव की गुंजाइश बढ़ सकती है।

अमेरिका को चीन से सबसे बड़ी चुनौती क्यों?

चीन की ताकत सिर्फ उसकी मुद्रा तक सीमित नहीं है। वह दुनिया के सबसे बड़े manufacturing और export hubs में शामिल है और वैश्विक supply chains में उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। अगर चीन अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ ज्यादा से ज्यादा कारोबार युआन में करने में सफल होता है, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युआन की मांग बढ़ सकती है। यही वजह है कि चीन की आर्थिक और तकनीकी महत्वाकांक्षाओं को अमेरिका एक बड़े रणनीतिक मुद्दे के तौर पर देखता है। लेकिन यहां यह समझना भी जरूरी है कि युआन का बढ़ना अपने आप डॉलर के कमजोर होने के बराबर नहीं है। डॉलर अभी भी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बेहद मजबूत स्थिति में है।

BRICS क्यों है महत्वपूर्ण?

BRICS का विस्तार और सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की चर्चा ने De-Dollarization की बहस को और तेज किया है। BRICS देशों का जोर इस बात पर रहा है कि आपसी व्यापार में जहां संभव हो, डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाया जाए। इसका उद्देश्य व्यापार को अधिक विविध बनाना और किसी एक देश की वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता कम करना है। समूह के भीतर रुपये, युआन, रूबल और अन्य राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने के प्रयास इसी दिशा में देखे जाते हैं। हालांकि, BRICS की अपनी एक साझा मुद्रा अभी वास्तविकता नहीं है। अलग-अलग देशों की आर्थिक नीतियों, मुद्रा बाजारों, व्यापार असंतुलन और वित्तीय प्रणालियों के बीच बड़ा अंतर है।

भारत का रुख चीन और रूस से अलग

भारत De-Dollarization की बहस में अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाता रहा है। भारत का लक्ष्य किसी एक मुद्रा को डॉलर की जगह स्थापित करना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारतीय रुपये की भूमिका बढ़ाना और वित्तीय विकल्पों को व्यापक बनाना है। भारत ने कई देशों के साथ रुपये में व्यापार को बढ़ावा देने की कोशिश की है। लेकिन यहां सबसे बड़ी चुनौती Trade Imbalance है। उदाहरण के लिए, भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है, जबकि रूस को भारत से उतने मूल्य का सामान निर्यात नहीं मिलता। ऐसे में अगर भारत रुपये में भुगतान करता है, तो रूस के पास बड़ी मात्रा में रुपये जमा हो सकते हैं। समस्या यह है कि भारतीय रुपया अभी युआन या डॉलर की तरह व्यापक अंतरराष्ट्रीय reserve और settlement currency नहीं है। इसलिए जमा हुए रुपये को खर्च या निवेश करने के लिए रूस को सीमित विकल्प मिलते हैं।

क्या BRICS डॉलर को हरा सकता है?

फिलहाल इसका सीधा जवाब नहीं है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ना और डॉलर को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से पूरी तरह हटाना दो अलग-अलग बातें हैं। डॉलर की ताकत केवल व्यापार से नहीं, बल्कि अमेरिकी वित्तीय बाजारों, Treasury securities, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग, liquidity और वैश्विक निवेश व्यवस्था से भी जुड़ी है। फिर भी चीन, रूस और BRICS देशों की कोशिशें यह संकेत जरूर देती हैं कि दुनिया अब एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था की तरफ बढ़ रही है जहां कई मुद्राओं और भुगतान प्रणालियों की भूमिका पहले से ज्यादा हो सकती है।

डॉलर का साम्राज्य अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन उसकी एकछत्रता को चुनौती जरूर बढ़ रही है। चीन-रूस का स्थानीय मुद्रा व्यापार, BRICS का विस्तार, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां और भारत की रुपये को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने की कोशिशें वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में धीरे-धीरे बदलाव की ओर इशारा करती हैं। आने वाले वर्षों में असली मुकाबला सिर्फ Dollar vs Yuan का नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि दुनिया की वित्तीय व्यवस्था कितनी multi-polar बनती है।

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