नई दिल्ली (प्रज्ञा पांडे)। सुबह का उजाला फैला, लेकिन कई घरों में सूरज की रोशनी नहीं, सिर्फ पानी दिखाई दिया। किसी के आंगन में नाव खड़ी थी, तो किसी की रसोई तक बाढ़ का पानी पहुंच चुका था। बच्चे कंधों पर थे, बुजुर्गों का हाथ थामे लोग सुरक्षित ठिकानों की ओर बढ़ रहे थे और उनके पीछे-पीछे चल रहे थे वे मवेशी, जो सिर्फ जानवर नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आजीविका का सहारा हैं। यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि असम की हकीकत है, जहां इस बार मानसून ने फिर से तबाही मचा दी है। ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, असम में बाढ़ से अब तक 75 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि करीब 3.32 लाख लोग अब भी इस आपदा से प्रभावित हैं। कई जिलें जलमग्न हैं, सैकड़ों गांवों का संपर्क टूट चुका है और हजारों परिवार राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। प्रशासन, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और सेना लगातार राहत एवं बचाव अभियान चला रहे हैं, लेकिन कई इलाकों तक पहुंचना अब भी चुनौती बना हुआ है।

इस त्रासदी की सबसे मार्मिक तस्वीर सिर्फ इंसानों की नहीं है। काजीरंगा के जंगलों में भी बाढ़ का पानी तेजी से फैल गया है। एक सींग वाले गैंडे, हिरण, जंगली भैंसे और दूसरे वन्यजीव ऊंचे इलाकों की ओर पलायन कर रहे हैं। वन विभाग ने संवेदनशील मार्गों पर निगरानी बढ़ा दी है, ताकि जानवर सुरक्षित तरीके से राष्ट्रीय राजमार्ग पार कर सकें और सड़क दुर्घटनाओं का शिकार न हों। पशुओं को बचाना भी राहत अभियान का अहम हिस्सा बन गया है



