जयपुर। राजधानी जयपुर के ऐतिहासिक परकोटे में स्थित पुरोहित जी के कटले और आसपास के बाजारों में गुरुवार, 17 सितंबर की सुबह भीषण आग लगने से अफरा-तफरी मच गई। कपड़ा, चूड़ी और अन्य सामान की दुकानों वाले इस व्यस्त बाजार में आग से बड़े आर्थिक नुकसान की आशंका जताई जा रही है। संकरी गलियों और दुकानों के बाहर रखे सामान के कारण राहत एवं बचाव कार्यों में भी चुनौतियां सामने आईं।
इस घटना ने एक बार फिर जयपुर के पुराने बाजारों में अग्नि सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि पिछले छह वर्षों में पुरोहित जी के कटले में यह तीसरा बड़ा अग्निकांड बताया जा रहा है।
छह साल में तीसरी बड़ी आग
जानकारी के अनुसार, जुलाई 2020 में भी पुरोहित जी के कटले में रात के समय आग लगी थी, जिसमें काफी नुकसान हुआ था। इसके बाद अक्टूबर 2022 में दीपावली से कुछ दिन पहले बाजार में दोबारा भीषण आग की घटना सामने आई। अब सितंबर 2026 में एक बार फिर आग ने बाजार को अपनी चपेट में ले लिया है।
लगातार हो रही घटनाओं के बीच स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि पिछली आग की घटनाओं के बाद किए गए सुरक्षा इंतजाम कितने प्रभावी साबित हुए। बाजार में बड़ी संख्या में दुकानें हैं, जहां कपड़े, प्लास्टिक, चूड़ी और अन्य ज्वलनशील सामग्री रखी जाती है। ऐसे में आग फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
हाइड्रेंट व्यवस्था पर भी उठे सवाल
पुरोहित जी के कटले में आग से निपटने के लिए करोड़ों रुपये की लागत से हाइड्रेंट पंप हाउस, पाइपलाइन, पानी की टंकी और निगरानी जैसी व्यवस्थाएं तैयार की गई हैं। बाजार में कई हाइड्रेंट लगाए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
हालांकि, कुछ व्यापारियों ने हाइड्रेंट के वाल्व और कपलिंग गायब होने का आरोप लगाया है। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी, लेकिन यदि उपकरणों में कमी पाई जाती है तो यह अग्नि सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर समस्या हो सकती है।
संकरी गलियां और अतिक्रमण बड़ी चुनौती
परकोटे के बाजारों में रास्ते पहले से ही सीमित हैं। दुकानों के बाहर सामान रखने और अतिक्रमण के कारण ये रास्ते और संकरे हो जाते हैं। आग लगने की स्थिति में दमकल वाहनों को घटनास्थल तक पहुंचने में परेशानी होती है, जिससे राहत कार्य प्रभावित हो सकता है।
सुबह करीब सात बजे आग लगने के कारण बाजार में भीड़ अपेक्षाकृत कम थी। यदि इसी तरह की घटना शाम के व्यस्त समय में होती, तो लोगों की आवाजाही और वाहनों के कारण स्थिति और जटिल हो सकती थी। अब प्रशासन के सामने फायर ऑडिट, हाइड्रेंट की नियमित जांच, अतिक्रमण हटाने और आपातकालीन रास्तों को खुला रखने की चुनौती है।
छह साल में तीसरी बड़ी आग के बाद जरूरत केवल नई घोषणाओं की नहीं, बल्कि पहले से मौजूद सुरक्षा व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी और प्रभावी क्रियान्वयन की है।



