देश के बड़े कारोबारी समूहों में शामिल Tata Group में चेयरमैन पद को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। Tata Sons के बोर्ड ने N. Chandrasekaran को अगले पांच साल के लिए कार्यकारी चेयरमैन के पद पर दोबारा नियुक्त करने का फैसला किया है। हालांकि, Tata Trusts ने इस निर्णय पर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे “अवैध” और कानूनी रूप से अमान्य बताया है। इस घटनाक्रम के बाद समूह के भीतर Corporate Governance और नेतृत्व को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।
चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति पर विवाद क्यों?
17 सितंबर 2026 को Tata Sons के बोर्ड ने N. Chandrasekaran के कार्यकाल को अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ाने का प्रस्ताव मंजूर किया। इससे पहले चंद्रशेखरन ने अगस्त में मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने के बाद दोबारा नियुक्ति के लिए उपलब्ध नहीं होने की बात कही थी। उनका वर्तमान कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होना है।
Tata Trusts के अनुसार, चंद्रशेखरन के दोबारा नियुक्ति नहीं लेने के फैसले को पहले ही स्वीकार किया जा चुका था। Trusts का दावा है कि नियुक्ति प्रक्रिया को दोबारा शुरू करने का निर्णय कंपनी के Articles of Association और पहले से तय प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।
Noel Tata ने जताया विरोध
Tata Trusts के चेयरमैन Noel Tata ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का विरोध किया है। Trusts का कहना है कि चेयरमैन की नियुक्ति के लिए Trusts द्वारा नामित निदेशकों की भूमिका महत्वपूर्ण है और संबंधित प्रस्ताव को आवश्यक समर्थन प्राप्त नहीं हुआ।
दूसरी ओर, Tata Sons के बोर्ड ने नियुक्ति के साथ-साथ कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया पर विचार करने का भी फैसला किया है। यह कदम Reserve Bank of India से जुड़े नियामकीय मुद्दों के बीच सामने आया है। Tata Sons की संभावित Listing को लेकर भी समूह के भीतर अलग-अलग राय बताई जा रही है।
Tata Group के सामने बढ़ी Governance चुनौती
Tata Trusts के पास Tata Sons में लगभग दो-तिहाई हिस्सेदारी है। ऐसे में बोर्ड और Trusts के बीच मतभेद का असर समूह की नेतृत्व व्यवस्था और भविष्य की रणनीतिक योजनाओं पर पड़ सकता है। हालांकि, चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर Tata Trusts की आपत्ति अपने आप में किसी अदालत का अंतिम फैसला नहीं है। विवाद के कानूनी और कॉरपोरेट पहलुओं पर आगे प्रक्रिया और संभावित चुनौती महत्वपूर्ण होगी।
इस घटनाक्रम ने Tata Group में उत्तराधिकार योजना, बोर्ड के अधिकार और Trusts की भूमिका को लेकर बहस को फिर तेज कर दिया है।



