नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Trade Deal) को लेकर बातचीत जारी है। दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी नई दिल्ली में बैठकर व्यापारिक संबंधों को और मजबूत बनाने तथा समझौते को अंतिम रूप देने के प्रयासों में जुटे हैं। हालांकि, इसी बीच अमेरिका के एक कदम ने नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने भारत को उन देशों की सूची में शामिल किया है, जिनके खिलाफ कथित अनुचित व्यापारिक प्रथाओं और जबरन श्रम से जुड़े उत्पादों के आयात को लेकर आपत्ति जताई गई है। इसके साथ ही अमेरिका ने ऐसे देशों से आयात होने वाले कुछ सामानों पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव भी रखा है।
अमेरिका के इस कदम की टाइमिंग को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। एक ओर दोनों देश व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के लिए लगातार बातचीत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव भारतीय निर्यातकों के लिए चिंता का विषय बन गया है।
क्या है पूरा मामला?
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने Section 301 के तहत की गई 60 जांचों के निष्कर्ष जारी किए हैं। इन जांचों में भारत सहित 54 अर्थव्यवस्थाओं को उन देशों की श्रेणी में रखा गया है, जो अमेरिकी आकलन के अनुसार जबरन श्रम (Forced Labour) से निर्मित उत्पादों के आयात और व्यापार को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे हैं।
अमेरिका का मानना है कि ऐसे उत्पाद वैश्विक बाजार में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करते हैं और उनकी कम लागत के कारण अमेरिकी कंपनियों तथा श्रमिकों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि जबरन श्रम से तैयार वस्तुएं अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों की भावना के खिलाफ हैं और इससे घरेलू उद्योगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यूएसटीआर ने स्पष्ट किया है कि यदि व्यापारिक साझेदार देश इस मुद्दे पर प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रहते हैं, तो अमेरिका अपने उद्योगों और श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए अतिरिक्त व्यापारिक उपाय लागू कर सकता है। इसी संदर्भ में कुछ देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रस्ताव भी चर्चा में है, जिसने वैश्विक व्यापार जगत में नई बहस छेड़ दी है।
भारत के लिए क्यों बढ़ी नई चिंता?
हालांकि भारत के लिए चिंता की सबसे बड़ी बात यह है कि यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते (Trade Deal) पर बातचीत निर्णायक चरण में पहुंच चुकी है। दोनों देश आर्थिक साझेदारी को मजबूत करने और व्यापारिक बाधाओं को कम करने के लिए लगातार चर्चा कर रहे हैं। ऐसे में अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अमेरिकी प्रस्ताव भारतीय निर्यातकों के लिए दबाव बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है।
अमेरिका ने संकेत दिया है कि जिन देशों ने जबरन श्रम (Forced Labour) से जुड़े उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगाया है या इस दिशा में प्रभावी कदम उठाए हैं, उन्हें अपेक्षाकृत कम अतिरिक्त शुल्क का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, जिन देशों को अमेरिकी मानकों पर खरा नहीं माना जाएगा, उनके उत्पादों पर अधिक टैरिफ लगाया जा सकता है।
किन-किन देशों पर अतिरिक्त टैरिफ का प्रस्ताव?
अमेरिका की ओर से प्रस्तावित अतिरिक्त टैरिफ का दायरा केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने भारत के साथ-साथ चीन, इजरायल, जापान, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान, जॉर्डन, बांग्लादेश, मलेशिया, थाईलैंड, ताइवान और वियतनाम समेत कई प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों को भी अपनी निगरानी सूची में शामिल किया है। इन देशों पर जबरन श्रम (Forced Labour) से बने उत्पादों के आयात पर प्रभावी रोक लगाने और संबंधित नियमों को लागू करने में विफल रहने का आरोप लगाया गया है।
इसके अलावा कनाडा, इक्वाडोर, यूरोपीय संघ, इंडोनेशिया, मेक्सिको और पाकिस्तान को भी उन देशों की सूची में रखा गया है, जो जबरन श्रम से तैयार वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध को प्रभावी ढंग से लागू नहीं कर पाए हैं।
इस पूरे विवाद की जड़ अमेरिका के 1974 के ट्रेड एक्ट का Section 301 प्रावधान है। यह कानून USTR को अन्य देशों की व्यापार नीतियों की जांच करने और उन्हें अमेरिकी हितों के खिलाफ पाए जाने पर जवाबी कार्रवाई की सिफारिश करने का अधिकार देता है। इसी प्रावधान के तहत अमेरिका अतिरिक्त टैरिफ, व्यापारिक प्रतिबंध या अन्य आर्थिक उपाय लागू कर सकता है।
हालांकि फिलहाल यह केवल एक प्रस्ताव है और इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है। लेकिन यदि अमेरिका अतिरिक्त शुल्क लागू करता है, तो भारतीय उत्पादों की अमेरिकी बाजार में कीमत बढ़ सकती है। इसका सबसे अधिक असर उन निर्यातकों पर पड़ सकता है, जिनका कारोबार बड़े पैमाने पर अमेरिकी बाजार पर निर्भर है। ऐसे में ट्रेड डील वार्ता के बीच आया यह प्रस्ताव भारत के लिए नई आर्थिक और कूटनीतिक चुनौती बन सकता है।



