नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का मिस्र दौरा दुनिया का ध्यान खींच रहा है। एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष के कारण होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री आवाजाही प्रभावित होने की खबरें हैं, तो दूसरी तरफ चीन मिस्र के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को और मजबूत करने में जुटा है। मिस्र के पास दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में शामिल स्वेज नहर है। ऐसे समय में शी जिनपिंग का काहिरा पहुंचना महज एक सामान्य कूटनीतिक यात्रा नहीं माना जा रहा। होर्मुज में बढ़ती अस्थिरता के बीच स्वेज नहर की रणनीतिक और आर्थिक अहमियत और बढ़ गई है।
होर्मुज में घट गई जहाजों की आवाजाही
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव और टैंकरों पर हमलों के कारण होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही में बड़ी गिरावट आई है। मंगलवार को कथित तौर पर सिर्फ चार मालवाहक जहाज इस समुद्री रास्ते से गुजरे, जबकि पिछले दस दिनों का औसत करीब 13 जहाज प्रतिदिन बताया गया। सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल व्यापार के लिए होर्मुज स्ट्रेट बेहद अहम है। ऐसे में इस रास्ते पर किसी भी तरह की लंबे समय तक चलने वाली बाधा का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और तेल की कीमतों पर पड़ सकता है।
शी जिनपिंग का मिस्र दौरा क्यों है खास?
करीब एक दशक बाद शी जिनपिंग का मिस्र दौरा ऐसे समय हो रहा है जब काहिरा अपनी विदेश नीति में विकल्पों का दायरा लगातार बढ़ा रहा है। मिस्र पारंपरिक रूप से अमेरिका का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसने चीन, रूस और यूरोपीय देशों के साथ भी अपने संबंध मजबूत किए हैं। चीन और मिस्र के बीच व्यापार करीब 21 अरब डॉलर तक पहुंचने की बात कही गई है। इसके अलावा स्वेज नहर आर्थिक क्षेत्र समेत कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीनी निवेश भी बढ़ रहा है। यही वजह है कि शी का मिस्र दौरा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसे मध्य पूर्व और अफ्रीका में चीन के बढ़ते प्रभाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
होर्मुज संकट के बीच स्वेज नहर का महत्व बढ़ा
होर्मुज और स्वेज दोनों ही वैश्विक व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते हैं। होर्मुज मुख्य रूप से खाड़ी क्षेत्र से ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि स्वेज नहर एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार का अहम रास्ता है। ऐसे में अगर होर्मुज लंबे समय तक अस्थिर रहता है, तो वैश्विक व्यापार और ऊर्जा कंपनियों के लिए वैकल्पिक मार्गों की अहमियत बढ़ सकती है। इसी संदर्भ में स्वेज नहर और मिस्र की रणनीतिक भूमिका पर दुनिया की नजर है।
चीन और मिस्र के रिश्ते अब सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं
चीन और मिस्र के बीच सहयोग अब सड़क, फैक्ट्री और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। अगस्त में दोनों देशों ने पहली बार संयुक्त हवाई अभ्यास भी किया। इसमें चीनी J-16 और मिस्र के राफेल लड़ाकू विमानों ने हिस्सा लिया। इस सैन्य सहयोग को दोनों देशों के बीच बढ़ती रणनीतिक नजदीकी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि मिस्र पूरी तरह चीन के खेमे में जा रहा है।
Middle East में अमेरिका बनाम चीन की अलग रणनीति
मध्य पूर्व में अमेरिका लंबे समय से अपनी सैन्य ताकत और सुरक्षा साझेदारियों के जरिए प्रभाव बनाए हुए है। दूसरी ओर चीन का तरीका काफी अलग नजर आता है। बीजिंग निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर, व्यापार, कूटनीति और रणनीतिक साझेदारियों के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। चीन इससे पहले ईरान और सऊदी अरब के बीच बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर भी मध्य पूर्व में अपनी कूटनीतिक ताकत दिखा चुका है। मिस्र इस रणनीति के लिए खास देश है। वह अरब दुनिया का एक प्रमुख केंद्र होने के साथ-साथ अफ्रीका का महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार है और BRICS का सदस्य भी है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पूरा घटनाक्रम?
होर्मुज और स्वेज दोनों ही भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। होर्मुज स्ट्रेट भारत की ऊर्जा सुरक्षा से सीधे जुड़ा है, जबकि स्वेज नहर भारत के यूरोप के साथ व्यापार के लिए बेहद अहम समुद्री मार्ग है। अगर मध्य पूर्व में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है और समुद्री रास्ते अस्थिर होते हैं, तो इसका असर कच्चे तेल की कीमतों, शिपिंग लागत, माल ढुलाई और महंगाई पर पड़ सकता है। भारत के लिए चुनौती यह भी है कि उसे अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत रखते हुए चीन की बढ़ती मौजूदगी और रूस के साथ संबंधों के बीच संतुलन कायम करना होगा।
बदल रहा है Middle East का पावर मैप?
मौजूदा घटनाक्रम से इतना जरूर संकेत मिलता है कि मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन पहले जैसा नहीं रहा। अमेरिका की सैन्य मौजूदगी अब भी बेहद मजबूत है, लेकिन चीन व्यापार, निवेश और कूटनीति के जरिए लगातार अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। शी जिनपिंग का मिस्र दौरा, होर्मुज संकट और स्वेज नहर की बढ़ती रणनीतिक अहमियत आने वाले समय में वैश्विक व्यापार और मध्य पूर्व की भू-राजनीति पर गहरा असर डाल सकती है।



