निकाय चुनाव में भाजपा ने अच्छी-खासी बढ़त हासिल की, कांग्रेस तमाम दावों के बाद भी पिछड़ गई। कांग्रेस के बड़े नेताओं ने खुद को अलग-थलग रखा, बयानबाजी को ही अपनी जीत का सबसे बड़ा हथियार माना। भाजपा पर आरोप पर आरोप लगाते रहे, शायद यह सोचकर कि जनता उन्हें जिताएगी जबकि हकीकत कुछ और रही। कांग्रेस ने वोट भले ही ज्यादा हासिल कर लिए पर सीटें हासिल करने में फेल रही। वो कारण खोजे ही नहीं जो उसे आगे लाने से रोक रहे थे। अंतिम समय में नए प्रत्याशियों का चयन भी इसकी बड़ी वजह रहा। भितरघात ने बचा खुचा काम भी पूरा कर दिया।
सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने स्थानीय चुनाव को पर्याप्त गंभीरता से क्यों नहीं लिया। पार्टी के भीतर समन्वय की कमी क्यों रही। कांग्रेस की पुरानी गुटबाजी कहें या फिर दिग्गज नेताओं के निकाय चुनाव को विधानसभा और लोकसभा चुनाव की तुलना में छोटा मानकर इसकी अनदेखी की। कांग्रेस के सभी बड़े नेता पूरी तरह गायब रहे। भाजपा मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा समेत अपने बड़े नेता रोड शो और चुनाव प्रचार में दिखे तो कांग्रेस के बड़े चेहरे वार्डों में प्रत्याशियों के साथ नजर ही नहीं आए। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत निकाय चुनाव को लेकर बयान जरूर देते रहे, लेकिन प्रत्याशियों के पक्ष में व्यापक प्रचार कार्यक्रमों को लेकर वो गैर हाज़िर रहे।
कांग्रेस में गहलोत, पायलट और डोटासरा खेमों की अलग-अलग सक्रियता को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। हाल में भी पार्टी के भीतर गुटीय खींचतान की चर्चाएं सामने आई। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बड़े नेता एक-दूसरे के प्रभाव वाले क्षेत्रों में सक्रिय होने से क्यों बचते रहे? प्रत्याशी पूछते रहे-हमारे साथ बड़े नेता कब? टिकट मिलने के बाद प्रत्याशी अपने-अपने वार्ड में प्रचार करते रहे, लेकिन बड़े नेताओं की मौजूदगी से मिलने वाला राजनीतिक और संगठनात्मक समर्थन उन्हें नहीं मिला, यह सवाल अब कार्यकर्ताओं के बीच भी चर्चा का विषय बन रहा है।
कांग्रेस के लिए यह चुनाव केवल पार्षद चुनने का चुनाव नहीं था, यह उसके शहरी जनाधार, संगठन और अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी की परीक्षा थी। यदि बड़े नेता अभी वार्डों में नहीं उतरे तो कार्यकर्ताओं के बीच गलत संदेश भी गया कि पार्टी स्वयं अपने प्रत्याशियों को लेकर गंभीर नहीं है।
कांग्रेस को यह समझना होगा कि स्थानीय निकाय ही संगठन की जमीनी ताकत की पहली परीक्षा होते हैं। वार्ड का कार्यकर्ता ही आगे चलकर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में पार्टी का आधार तैयार करता है। ऐसे में इस चुनाव को गंभीरता से नहीं लेना भी नेताओं की कमी रही। ऐसे नेताओं पर एक्शन लिया जाना चाहिए।



