चंडीगढ़। पंजाब में विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी गतिविधियां धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं। भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के बीच संभावित गठबंधन को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि बीजेपी ने फिलहाल राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी का संकेत दिया है, लेकिन इसके बावजूद दोनों दलों के दोबारा साथ आने की संभावनाओं पर राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं।
बीजेपी के एक शीर्ष संगठनात्मक पदाधिकारी की ओर से पंजाब की सभी सीटों पर पार्टी की तैयारी को लेकर बयान सामने आने के बाद गठबंधन की अटकलों को झटका लगा। पार्टी लगातार राज्य में अपने संगठन को मजबूत करने और पहले की तुलना में अधिक सीटों पर प्रभाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।
दूसरी तरफ शिरोमणि अकाली दल के लिए भी आगामी विधानसभा चुनाव बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। पार्टी पंजाब में अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में बीजेपी के साथ संभावित समझौता उसके चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
बीजेपी और अकाली दल का रिश्ता काफी पुराना रहा है। दोनों पार्टियां लंबे समय तक गठबंधन में चुनाव लड़ती रही हैं। 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर अकाली दल ने एनडीए से अलग होने का फैसला किया था। इसके बाद दोनों दलों ने अलग-अलग चुनावी रास्ता अपनाया। अब पंजाब की बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में पुराने गठबंधन की संभावित वापसी को लेकर चर्चा फिर तेज है।
पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस भी प्रमुख राजनीतिक ताकतें हैं। ऐसे में बीजेपी और अकाली दल के बीच गठबंधन होता है या दोनों पार्टियां अलग-अलग मैदान में उतरती हैं, इसका असर पूरे चुनावी गणित पर पड़ सकता है। खासकर ग्रामीण और शहरी वोटों के समीकरण में बदलाव की संभावना जताई जा रही है।
बीजेपी के अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी को पार्टी के विस्तार की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं, अकाली दल अपने दम पर मजबूत प्रदर्शन करने की कोशिश में जुटा है। दोनों दलों के बीच भविष्य में सीटों और नेतृत्व को लेकर बातचीत होती है या नहीं, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल बीजेपी की ओर से अकेले चुनाव लड़ने का संकेत स्पष्ट है, लेकिन चुनाव में अभी समय बाकी है। ऐसे में पंजाब की राजनीति में यह सवाल बना हुआ है कि बीजेपी और SAD अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे या आखिरी दौर में कोई नया सियासी समीकरण सामने आएगा।



