नई दिल्ली। नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी इलाकों में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को लेकर चिंता और बढ़ा दी है। इस आपदा की सटीक वजह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है, लेकिन ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटकर नीचे गिरने और उससे अचानक पानी व मलबे का प्रवाह बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। खास बात यह है कि हादसे से कुछ महीने पहले जारी दो रिपोर्टों में हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से कमजोर होने और इससे करोड़ों लोगों की आजीविका पर पड़ने वाले असर को लेकर चेताया गया था।
अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र की रिपोर्टों के मुताबिक, वर्ष 2000 के बाद हिंदूकुश हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार पहले की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई है। 1975 के बाद से कई ग्लेशियरों की मोटाई में 27 मीटर तक की कमी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका असर केवल पर्वतीय इलाकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नीचे रहने वाली बड़ी आबादी के जल संसाधनों और आजीविका पर भी पड़ सकता है।
63 हजार से ज्यादा ग्लेशियरों पर खतरा
हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में करीब 63,700 ग्लेशियर हैं, जो लगभग 55,782 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं। इन्हीं ग्लेशियरों से एशिया की कम से कम 10 प्रमुख नदी प्रणालियों को पानी मिलता है। इन नदियों पर अरबों लोगों की कृषि, पेयजल और अन्य जरूरतें निर्भर हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 4,500 से 6,000 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद ग्लेशियरों का करीब 78 प्रतिशत हिस्सा बढ़ते तापमान के प्रति बेहद संवेदनशील है। आईसीआईएमओडी के महानिदेशक पेमा ग्यात्सो ने इसे तेजी से सामने आ रहा गंभीर संकट बताया है।
ग्लेशियरों का नुकसान पूरे क्षेत्र में एक समान नहीं है। पूर्वी हेंगदुआन शान पर्वतों के कुछ हिस्सों में तीन दशकों के दौरान ग्लेशियर क्षेत्रफल में 33 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। वहीं सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी घाटियों में ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में बड़ी मात्रा में कमी सामने आई है। इन तीनों बेसिनों में हिंदूकुश हिमालय के 74 प्रतिशत से अधिक ग्लेशियर स्थित हैं।
कैसे आई नेपाल में विनाशकारी बाढ़?
26 अगस्त को नेपाल और तिब्बत की भोटेकोशी तथा त्रिशूली घाटियों में अचानक पानी और मलबे का विशाल बहाव आया। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, हिमालय में ग्लेशियर का करीब 600 मीटर चौड़ा हिस्सा टूटकर लगभग 1.2 किलोमीटर नीचे घाटी में जा गिरा। इसके बाद बर्फ, पानी और चट्टानों के मिश्रण ने रास्ते में भारी मात्रा में मलबा जमा कर दिया।
मलबे से नदी का रास्ता अस्थायी रूप से अवरुद्ध होने के कारण पानी पीछे जमा होता गया। दबाव बढ़ने के बाद यह अवरोध टूट गया और पानी का तेज बहाव नीचे की घाटियों में पहुंचा। इससे गांवों, सड़कों, पुलों और अन्य ढांचों को भारी नुकसान हुआ।
इस आपदा में नेपाल और तिब्बत में सैकड़ों लोगों की मौत हुई है, जबकि हजारों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। हालांकि, वैज्ञानिक और अधिकारी अभी घटना के कारणों की विस्तृत जांच कर रहे हैं। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की पृष्ठभूमि में यह त्रासदी हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन और आपदा जोखिम को लेकर गंभीर चेतावनी के तौर पर देखी जा रही है।



